"सफ़र-ए-ज़िंदगी"
कोई भी यूँ ही मंज़िल नहीं पाता,
रास्ते में सौ बार गिरता-उठता है।
पाँव में छाले, आँखों में सपने,
हर मोड़ पर इक इम्तिहान देता है।
कभी करियर का बोझ कंधों पर,
डिग्रियों के ढेर में उम्मीदें ढूँढता है।
रात-रात भर जागती हैं आँखें,
सुबह इंटरव्यू में हौसला बुनता है।
कभी घर की छत का सवाल,
माँ की दवाई, बहन की पढ़ाई,
बाप के झुके कंधों का मान,
अपनी ख्वाहिशों को कोने में छुपाई।
कभी दिल का कोई कोना रोता है,
प्रेम की नदी में तूफ़ान आता है।
किसी को पाकर भी खो देने का डर,
तो किसी को खोकर भी निभाता है।
कभी दोस्तों की भीड़ में अकेला,
ताने सुनता, फिर भी मुस्कुराता है।
लोग कहते हैं 'कब बनेगा कुछ',
वो चुपचाप अपना कल बनाता है।
कभी जेब खाली, पेट की आग,
फिर भी किसी के आगे हाथ न फैलाता है।
दो रोटी कम खाकर भी सो जाता है,
पर अपने उसूलों को न बिकने देता है।
यूँ ही नहीं बनते लोग बड़े,
हर ठोकर ने उन्हें तराशा है।
जो हँसते हैं आज कामयाबी पर,
उन्होंने अँधेरों में चिराग़ जलाया है।
संघर्ष की भट्टी में तपकर ही,
सोना भी कुंदन कहलाता है।
जो टूटकर भी चलता रहा,
वही इक दिन मुकाम पाता है।
इसलिए जब देखो किसी को शिखर पर,
उसकी चढ़ाई भी याद रखना।
हर मुस्कान के पीछे छुपा है,
एक लंबा, थका हुआ सफ़र अपना।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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