अनजान मंज़िलों की तलाश में चलते चले गए,
ख़्वाब आँखों में लिए हम, हालात से लड़ते चले गए।
हर मोड़ पर सवाल था, हर राह पर धुआँ,
सच की तलाश में कई सच पीछे ही रह गए।
छूकर भी जिनको लौट आए प्यासे ख़्याल,
कुछ ख़्वाब थे जो नींद की दहलीज़ पर जमते चले गए।
तूफ़ान से कहा कि ज़रा हौसला तो देख,
हम कश्तियाँ जलाकर भी दरिया में बहते चले गए।
थककर कहीं रुके तो ये एहसास हो गया,
रास्ते ही मंज़िल बने, मंज़िल ही खोये चले गए।
अनजान मंज़िलों की तरफ़ हम जब बढ़ते हो गए,
तेरी एक मुस्कान से ही सारे सफ़र आसान हो गए।
ख़्वाब आँखों में सजा कर, धूप–बारिश झेल ली,
तेरे क़दमों की आहट में सारे डर वीरान हो गए।
हर मोड़ पर सवाल थे, हर राह कुछ कहती रही,
तुझसे मिलने की चाहत में सारे सवाल बेईमान हो गए।
छू लिया जिन ख़यालों ने तेरी ज़ुल्फ़ों का सरूर,
नींद की दहलीज़ पर आकर वही अरमान हो गए।
तूफ़ानों से कह दिया—अब लौट जाओ इस दफ़ा,
तेरी आँखों के किनारे जब हमारे जहान हो गए।
हमने जलाईं कश्तियाँ, फिर भी डूबे नहीं कभी,
तेरे इश्क़ के दरिया में यूँ बेपरवाह इंसान हो गए।
जो साथ चल रहे थे, वो भीड़ बनकर छूट गए,
और जो छूट गए हमसे, वही दिल की पहचान हो गए।
शीशों के इस शहर में जब नाम तेरा ले लिया,
सच कहें तो उसी पल हम थोड़े से नादान हो गए।
वक़्त ने हथेलियों से रेत सा गिराया हमें,
हम उम्र भर लम्हों को मुट्ठी में भरते चले गए।
थक के जब रुके कहीं, तो समझ आया हमें,
रास्ते तेरी याद बने, मंज़िलें अनजान हो गए।
आईने ने जब पूछा—“अब तू है भी या नहीं?”
तेरी आँखों में देखा तो हम ख़ुद से हैरान हो गए।
आख़िरी सच यही निकला, इश्क़ की तलाश में हम
ख़ुद ही ग़ज़ल, ख़ुद ही बयान हो गए।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







