चमकती धूप, धुंधली सी हो गई
शायद शाम हो गई
इंतजार में वो ,दुबली सी हो गई
शायद शाम हो गई
पंछियों के झुंड ,अब मुड़ने लगें हैं
घोंसलों में कुछ, खलबली सी हो गई
शायद शाम हो गई
सुबह से दोपहर तक ,अच्छी खासी थी, वो
पता नहीं क्यों ,दुबली सी हो गई
शायद शाम हो गई
भूल नहीं पाती, उसके आने के वादे को
ढूंढती नजर उसकी, बावली सी हो गई
शायद शाम हो गई
सूरज के संग वो भी कहीं गुम हो जाती है
सबके बीच जैसे अजनवी सी हो गई
शायद शाम हो गई।।
यह रचना, रचनाकार के
सर्वाधिकार अधीन है
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







