तमाशा बन के रह जाती मोहब्बत महज़ बाज़ारों की ज़ीनत में,
अगर जज़्बात ही गवाह न होते तो ये ज़माना सच परखता भी क्या।
जुबां खामोश रह कर भी सब अफ़साने बयां कर देती है पल में,
तुम धड़कनों को न सुन पाते तो लफ्ज़ खुद को बयां करता भी क्या।
मुसाफ़िर धूल का होकर भी तेरी राह की चौखट चूम लेता है,
जो तेरी बंदगी का सुकूँ न मिलता तो राही राह बदलता भी क्या।
ख्यालों की हदों में तुम ही तुम हर तरफ बिखरे नजर आते हो,
जो दिल से याद ही न आते तुम तो ये आइना अक्स बदलता भी क्या।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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