पैसों की भी
एक उम्र होती है,
जो सिक्कों पर नहीं
आँखों की चमक पर लिखी जाती है।
जवान पैसे
हाथों में आग की तरह जलते हैं—
खर्च हो जाने को आतुर,
दिखावे में मुस्कुराते हुए।
पर जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है,
पैसे भी सोचने लगते हैं,
हर ख़र्च से पहले
दिल से सलाह करते हैं।
कुछ पैसे
दवाइयों की शीशी में
चुपचाप पड़े रहते हैं,
उनकी खनक में अब शोर नहीं,
बस साँसों की ज़रूरत होती है।
बूढ़े पैसे
तिजोरी में नहीं,
अनुभव में रखे जाते हैं—
जहाँ मुनाफ़ा नहीं,
सुकून ब्याज देता है।
अजीब सच है,
जिंदगी के आख़िरी मोड़ पर
पैसों की उम्र
हमसे ज़्यादा हो जाती है,
और हम
उन्हें नहीं,
वे हमें सँभालते हैं।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







