#blog - "जज़्बात और मां"
....आज मेरा गहन विवेचन और चिंतन जज़्बातों पर है। और एक संघर्ष करता व्यक्ति किस तरह अपने अंदर कल्पनाएं संजोता है।इसको लेकर मेरे शब्दों को अपने और आपके विचारों, हृदय में पिरोने का प्रयास है... क्योंकि ये हम सबकी कहानी है।
हम पता है कि जब हम इस संसार में आये है,तो मां बाप हमें जितना अच्छा हो सके ,उतनी बेहतर जीवन देने का प्रयास करते हैं, छोटी बड़ी हर वो ख्वाहिश पूरी करते हैं।जो आप उनसे मांग करते हो...
स्वयं सुखा खा कर,हमारे लिए अच्छा खाना रखतें हैं....
वो पुराने फटें कपड़ों में हर त्यौहार मना लेते हैं ताकि उनके बच्चों को वो सब दिला पाये। दुःख के बिस्तर पर सो कर अपने बच्चों को मखमल चादर में सुलाते है, और भी बहुत कुछ.. बहरहाल।
अब सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील विचार जो एक स्टूडेंट हो या कोई भी संघर्ष करता इंसान हो ,सबके भावों को अभिव्यक्त करेगा।
मैं स्टूडेंट अपने कमरें में बैठी अपने किताबों को पलट रही थी,मेरे रूम में रखें है मेरे अच्छे कपड़े जिनमें इत्र की तरोताजा खुशबु महक रही है,मेरी बैठने की कुर्सी किसी राजा महाराजा के सिंहासन से कम नहीं है, और मेरे साइड में चलता कुलर मानो मनाली की ठंडक दे रहा हो।..
ऐसे मैं मुझे अचानक! आवाज आई हे! राम बहुत थक गई हूं,अब काम ना हुआ जाता। तभी मैं एकाएक शून्य ही रह गयी। क्योंकि मेरी मां जो मेरे लिए सुबह से शाम तक लगी रहती है। कामों में ताकि उसके बच्चे पढ़ पाये...इस उम्मीद के साथ सामंजस्य स्थापित करके वो हर दिन लड़ती है, खुद को भूलकर, अपने दर्द को भूलकर बस लगी रहती है।
सच बताऊं तो.. मैंने मेरी मां के आंखों में वो नमी देखी ,उनको जब भी घर के कामों में थकते देखती हूं तो.. मेरी रूह कांप जाती है, क्योंकि वो मेरे लिए दर्द भूलकर लगी है, ताकि उनके बच्चे उनकी ये लाइफ को और बेहतर बनायेंगे,
कभी बैठना अपनी मां के पास और देखना गौर से उनकी तरफ़ एक दम शांति से, और सोचना की क्या इनका मन नहीं होता होगा? अच्छे कपड़े पहनने का,या घुमने का,या अपने सपने पुरे करना का??
उनके चेहरे पर जो शून्य का भाव हेना , बहुत कुछ सीखा जाता है,, कभी देखना अपनी मां को ,काम करते हुये एक अलग सा विचार आपके भावों में कौंधेगा...आपकी आंखें नम हो जायेगी की,, मुझे अच्छे जीवन देने के लिए मेरी मां आराम की उम्र में काम करती है,और मुझे बचाती है कि मेरी बेटी/बेटा पड़ेगी अफ़सर बनेंगी.।
मां तो ना पढ़ी पर बच्चों को पढ़ाने के लिए खुद को मजबूत बना लेती है।
सोचना बस शांत दिमाग से की कितने जज़्बातों को हम महसूस ही नहीं कर पाते जो अपने है। मदर्स डे पर स्टेटस लगा कर बस दिखावा कर लेते हैं क्योंकि हमें खुद का तो कुछ नहीं जानना,बस दुसरो को कांपी करना है,उनको फोलो करना है, क्योंकि दिखावा जरूरी है, मां पापा का संघर्ष तो कभी नजर नहीं आयेगा।
" श्रीमद्भागवत "में लिखा है कर्म लौट कर आता ज़रूर है।जब आप माता-पिता बनोगे तो समझ आयेगी मां की थकावट, क्या होती है और महसूस होगी, उनकी आंखों की नमी उस पल आपको सब याद दिला देगी।
मैं हर पल अपने कमरे से देखती मेरी मां की वो,थकावट मेरे जज़्बातों से सवाल करती है..कि करना है कुछ जिससे मैं इनको वो खुशी दे पाऊं, मां का वो शब्द की पढ़ लें बेटा हमें आराम आ जायेगा..
ये सब बातें सोचते सोचते मेरी आंखें भी जवाब देती है!.....
एक मां अपने बच्चों के साथ दोगुनी मेहनत करती है फर्क बस इतना है हम परीक्षा देते हैं और मां अपना जीवन।
दो लाइन मेरे जज़्बात से मां के लिए..
"मेरे जज़्बात मैंने तेरी ,आंखों में देखें हे मां,
मेरी खुशी के लिये तेरी, थकावट देखी है मां।
सहम सा गया हूं खुद मैं मां,
देख तेरे बेटे का भी टेम आवेगा।
मां कि भूमिका जब ओर बढ़ जाती है तब आपके पिता इस दुनिया में ना हों... सोचिये जरा की मां कितनी और मजबूत बनती होगी बच्चों के सपने के लिए, पिता की कमी पूरी करने के लिये...।
इसलिए खुब पढ़ो और वास्तविकता पहचानों ना कि इस स्टेटस के जमाने में लोग Last seen को छिपा देते हैं ऐसे में आप विश्वास की बात करते हो!
सरल बनों सहज बनों.. अपने बुढ़े मां बाप की तरफ ज़रूर देखो ताकि बाहरी मोटिवेशन की जरूरत खत्म हो। और आपके मां के सपनों को सही दिशा मिलें।
मां बाप वहीं रहते हैं बस बच्चे आगे निकल जाते हैं। हमें कोशिश करने है की जिन्होंने इतनी प्यारी जिंदगी दी उनको पीछे नहीं आगे लेकर चलना है।
मैंने जो लिखा वो महसूस किया है,और उम्मीद है आप लोगों ने भी इस भाव में स्वयं को रखकर देखा होगा।
बहुत बहुत धन्यवाद अपने मेरे भावों को अपने भावों में समेटकर पढ़ाने के लिए ।
#धन्यवाद आभार प्रणाम
✍लेखिका कवि-नीतू नागर (अम्बर) नरसिंहगढ़ मध्यप्रदेश


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
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