घर से निकले थे हम मजबूरी के सहारे,
पर किसे पता था मिलेंगे माँ जैसे इशारे।
माँ नहीं हैं, फिर भी कमी खलने न दी,
हर दर्द में उन्होंने अपनी ममता भर दी।
पराये शहर में जब आँखें भर आती हैं,
तो उनकी गोद हमें फिर से जीना सिखाती है।
सही-गलत में चुपचाप साथ निभाती हैं,
हम टूटें तो ढाल बनकर हमें बचाती हैं।
त्योहार आए और घर न जा पाए हम,
तो अपने हाथों से रोटियाँ खिलाती हैं हर दम।
दादी सी मस्ती, माँ सा प्यार लुटाती हैं,
हमारी हर उदासी को हँसी बना जाती हैं।
कह दें अगर आज कुछ बनाया नहीं,
तो अपने आँचल में हमें बिठा लेती हैं वहीं।
पराये कमरे में भी परिवार सा एहसास,
उनकी ममता ने कर दिया दिल को उदास से खास।
लोगों को देख समझो — बस यही सिखाती हैं,
हर मोड़ पर हमें सही राह दिखाती हैं।
घर से दूर होकर भी तन्हा नहीं हम,
क्योंकि उनकी दुआओं ने थाम रखा हर दम।
किराए की छत के नीचे जो माँ मिल गई,
वो किस्मत हमारी खुद चलकर आई।
भगवान हर किसी को ऐसी ममता दे,
जो अनजान दिलों को भी अपना सा कर दे। 💞


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







