मुहब्बत चुभ गयी है फांस की तरह मेरे सीने में
धड़कन भी दर्द से इज़ाज़त लेती है धड़कने में
न जाने कब थमेगा मेरी तड़पती साँसों का दौर
बहुत तक़लीफ़ होती है मुझे इस तरह जीने में
इश्क़ ने कहीं का न रखा जीते जी लाश हुए हैं
मन मर गया कितना वक़्त हैं ज़िस्म क़ो मरने में
तेरे इश्क़ में दोनो जहाँ वार गए पऱ तू न मिला
दिल-ए-दाग़-दार क़ो जगह कहाँ हैं भटकने में
थकी आँखे विराम लेना चाहती हैं तेरी बाहों में
तुमनें बड़ी देर कर दी मेरे जानाँ मुझे समझने में
कृष्णा क़ो रोग लगा तेरा तलब खा रही पल-पल
तेरे इश्क़ की तङपन ने कसर न रखी तड़पने में.....
-कृष्णा शर्मा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







