मोह-माया की जंजीरों ने, मानव को भरमाया है,
सत्य छोड़कर झूठ के पथ पर, जीवन को उलझाया है।
छल-कपट की काली छाया, कब किसका हित करती है?
क्षणिक लाभ के लोभ में पड़कर, आत्मा भीतर मरती है।
बेईमानी की रोटी खाकर, तृप्ति कभी न मिल पाती,
अंतरमन की पावन गंगा, मैली होकर रह जाती।
लोभ जहाँ मन में बस जाता, प्रेम वहीं खो जाता है,
स्वार्थों का अंधियारा आकर, मानव को भरमाता है।
मिथ्या वाणी, कपटी चेहरे, कब तक साथ निभाएँगे?
सत्य-ज्योति के आगे आखिर, झूठ कहाँ टिक पाएँगे?
ईर्ष्या-द्वेष की ज्वाला जलकर, अपने घर को खाती है,
दूसरों का अहित सोचने से, अपनी शांति जाती है।
धन से बढ़कर सत्य अमर है, यही सृष्टि का सार है,
निर्मल मन ही सबसे सुंदर, यही जीवन का हार है।
सदाचार की राह कठिन है, फिर भी मंगलकारी है,
यही मनुज के उज्ज्वल भविष्य की, सबसे बड़ी तैयारी है।
त्याग, दया, करुणा, सेवा से, जीवन धन्य बनाइए,
मोह, कपट, बेईमानी का, हर बंधन अब तोड़ जाइए।
सत्य, धर्म और प्रेम जहाँ हों, ईश्वर वहीं निवास करे,
ऐसे पावन कर्मों से ही, मानव अपना विकास करे।
जो निष्कपट जीवन जीता है, वही जग में सम्मानित है,
सत्य-सुगंध से महका जीवन, सदा-सदा अभिनंदित है।।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







