चाँद—
आज पूरा नहीं था,
बस एक पतली-सी स्मृति था,
जो आकाश की हथेली में
ठंडी जलन की तरह टिकी थी।
मैंने देखा—
हवा अपनी ही तहों में उलझी थी,
जैसे कोई परंपरा
समय से हारकर
काग़ज़ का कफ़न ओढ़े।
…और फिर कुछ नहीं—
बस एक ठहरा हुआ खालीपन,
जिसमें कोई आवाज़
जन्म लेने से डर रही थी।
उस धुंध में—
आकृतियाँ थीं,
पर स्थिर नहीं,
सिर्फ़ उन बातों के निशान
जो कभी पूरी नहीं हुईं।
मैं झुका—
तो एक पत्ता मिला,
बिना लिखे,
फिर भी जलता हुआ पढ़ा जा सकता था।
तब जाना—
यादें शब्दों से नहीं,
ज़ख्मों से बनती हैं।
वहीं—
एक अधूरा वृत्त
हवा में खुद को दोहराता रहा,
जैसे कोई आत्मा
अपने ही भीतर भटक रही हो।
…और एक क्षण ऐसा भी आया—
जब सब कुछ रुक गया,
न धुंध हिली,
न भीतर की आवाज़।
कमल दूर नहीं थे,
पर उनका भार
जल को बेचैन किए रहा,
लहरें हर बार
अपना नाम तोड़ देती थीं।
मैंने हथेली फैलाई—
एक ओस-बूंद
इस बार ठहरी,
फिर धीरे-धीरे फिसली,
और चुपचाप खो गई—
जैसे सौंदर्य
अपने ही विराम में
स्वयं को मिटा देता हो।
और उसी ठहराव में—
मैंने जाना,
रेखाएँ कभी पूरी नहीं होतीं,
वे फटती हैं,
फिर किसी अनदेखी साँस में
धीरे-धीरे
सिल जाती हैं।
अब—
जब आँखें बंद करता हूँ,
कुछ साफ़ नहीं दिखता,
बस एक धीमी-सी गूँज रहती है—
कि हम शब्द नहीं हैं,
हम वह खाली जगह हैं
जहाँ अर्थ
जन्म और मृत्यु के बीच
थोड़ी देर
ठहरता है।
-इक़बाल सिंह “राशा”
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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