किनारे
हमेशा कमज़ोर समझे जाते हैं,
पर
लहरों को दिशा
वहीं से मिलती है।
मैं भी
बहुत बार
बीच धार में टूटा,
जब शब्द डूबने लगे
और सपने
भीगकर भारी हो गए।
तब
किसी अदृश्य किनारे ने
मेरी कलाई थामी—
कभी माँ की चुप दुआ बनकर,
कभी मित्र की आँखों में
ठहरी उम्मीद बनकर।
किनारे
चलना नहीं सिखाते,
पर
गिरने के बाद
खड़ा होना ज़रूर सिखाते हैं।
जो किनारे से डरते हैं
वे गहराई का
अर्थ नहीं समझते,
और
जो किनारे को पकड़ लेते हैं
वे ही समुद्र से संवाद कर पाते हैं।
आज भी
मैं बहता हूँ,
पर जानता हूँ—
हर थकान के बाद
कोई न कोई किनारा
मेरा इंतज़ार कर रहा है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







