कविता:जीवन के पचास साल
दिनांक:20/04/2026
पच्चीस साल गुजरे मेरे मात पिता के संग।
भाई बहन से मिलकर जीती जीवन की जंग।
बचपन से पच्चीस तक परिवार रहा तंग।
पढ़ लिखकर सबने मिलकर खुशियां बांटी संग।
पच्चीस साल गुजर गए संस्कारों के संग।
रोजगार करने लगे हम सब मस्ती के संग।
पवित्र बंधन परिणय हुआ दीपिका के संग।
मात पिता की सेवा करके जीवन हुआ चंग।
भाव भक्ति और कठिन त्याग जीवन में लाया उमंग।
नौ वर्षों की कठिन तपस्या से जीवन में आई तरंग।
जन्माष्टमी पर संतान सुख कृष्णा बिटिया के संग।
तृप्त हुई मन की इच्छा जीवन बना दबंग।
छोटी छोटी खुशियां मिलती रही सबको संग संग। ।
मकान गाड़ी रोजगार सब मिले आनंद ही आनंद।
दुगना आनंद जब हुआ हिताक्षी का जन्म।
एक से दो दो से चार आई जीवन में उमंग।
पच्चीस साल और गुजर गए पत्नी बच्चों के संग।
शिव की कृपा बनी रहे मेरी उड़ती रहे पतंग।
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सत्यवीर वैष्णव बारां राजस्थान


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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