हर रात जली उत्सव-सी,
दिन नींदों में खोता था,
मैं दर्द छुपाकर होंठों से
बस हँसता ही होता था।
सपनों की राख समेटे मैं
चुपचाप किनारे बैठा,
जग कहता है —“जीत गया”,
मन कहता — “सब कुछ ऐंठा।”
जब दर्द उठा, स्वर जागे,
जब प्रेम जगा, मन टूटा,
टूटे मन की किरचों से,
हर गीत नया फिर फूटा।
गीतों ने यश तो दे डाला,
पर चैन कहीं न मिल पाया,
भीड़ भरे इन रस्तों में,
मैं खुद से दूर ही आया।
सबके आँसू अपने थे,
सबकी पीड़ा गाई थी,
सूखी धरती के होंठों तक
मैंने नदिया पहुँचाई थी।
पर मेरी सूनी आँखों में
बरसात नहीं फिर आई,
मैं प्यास लिये बैठा ही रहा,
दुनिया ने जीत बताई।
अब लौट चला हूँ भीतर मैं,
जहाँ मौन मुझे अपनाए,
जहाँ टूटा मन धीरे से
खुद को फिर से पढ़ पाए।
जग चाहे जय-जयकार करे,
मैं सच से मुँह न मोड़ूँगा,
जो खोया है इन मेले में,
उसे ढूँढ़ने फिर दौड़ूँगा।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







