समझा जिसे हमसफर वही बेगाना था।
समझा कारवाँ पर हर कोई अकेला था।
अलग ख़्वाब लिए मंजिल तलाशते रहे।
कौन यहां शागिर्द, हर कोई अंजाना था।
बढ़ता रहा कारवाँ, कहने को भीड़ थी।
न कोई लक्ष्य था न कहीं ठिकाना था।
आते जाते थे कई, बिछड़ते जाते सभी।
बढ़ते हाथ थामें सबको चलते जाना था।
भटके हुए सब यहां मंज़िल के राहगीर।
हर एक का अपना एक अफ़साना था।
कौन पाता वहां न थी राह नही मंजिल।
अंधेरों में भटकता सारा ही ज़माना था।
भटकती जाती अंधरो में अंधी थी भीड़।
एक दुजे का हाथ थामे बढ़ते जाना था।
हर एक ने बना दी, अपनी एक तस्वीर।
दूर टिमटिमाता वही अनजान खुदा था।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







