हम मुफ़लिसों का कोई सहारा कहाँ होता है,
सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान से अब गुजारा कहाँ होता है,
उन दिनों देखते थे जिन्हें जी भरके देख लेते थे,
इन दिनों अब वो नज़ारा कहाँ होता है,
वो पूछती है हमसे हमारी खैरियत का हाल,
हमें नासाज़ ए दिल बताना गंवारा कहाँ होता है,
तोड़ती हो दिल मेरा, तोड़ो शौक से..
इसमें कोई ख़सारा तुम्हारा कहाँ होता है,
डूब जाएंगे हम भी दरिया पार करते करते,
हर कश्ति का किनारा कहाँ होता है,
बंद कर लिए हैं ख्यालों की खिड़की उसने,
अब उनके दरो दिल पे दस्तक हमारा कहाँ होता है,
लाख आजमाइशें कर ली हमने फिर से दिल लगाने की लेकिन,
पहली मोहब्बत सी मोहब्बत फ़िर दोबारा कहाँ होता है,
@कमलकांत घिरी
(मनकी, लोरमी, मुंगेली, छत्तीसगढ़)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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