तुम जीत सकते हो पर संतुष्ट नहीं होते।
क्योंकि समानता के तुम स्वामी हो,
पर तुम नौकर बन जाते हो ,
एक इंसान नैतिकता और भौतिकता दोनों से मिलकर बनता और आगे बढ़ता है,
पर हमारी बुद्धि में आगे हम भौतिकता से बढ़ते जाते हैं,
और नैतिकता की मांग हम कमजोर वर्ग से करते हैं,
और इससे हमें संतुष्टि नहीं मिलती,
सबसे पहले स्पष्ट भौतिकता जरूरी है जो,
बाहरी मजबूती, लचीली, गति और धार रखती हो,
और अंदर स्पष्ट नैतिकता हो जो नियंत्रण, प्रभावी दिशा, स्वतंत्र प्रकाश का काम करती है,
मगर बुद्धि जीवियों ने भौतिकता से आगे बढ़ते गए, बढ़ते गए और नैतिकता को नीचे दबाते गए,
सब तरफ भौतिकता का बंटवारा नहीं हुआ,
अधिकतम लोगों के पास नैतिकता रह गई,
लेकिन अवसर और पहचान तक पहुंचने के लिए भौतिकता नहीं थी,
तब बुद्धि जीवियों ने दो शब्द निकाले नसीब और मेहनत,
लेकिन नसीब यहां भौतिकता जो आपको आपको उस जगह पहुंचाती है जहां खुद को प्रकट कर सको,
लेकिन ये नसीब न्यूनतम लोगों के हाथ आ गया जिसे लेने को उनकी पीढ़ियों ने साथ दिया,
और मेहनत वो नैतिकता है जो अधिकतम लोगों के पास है,
तब गरीबी और बुराई बनती गई,
जहां बुद्धि जीवियों ने फिर एक शब्द निकाला विकास ,
यहां उन नसीबी लोगों ने ही सुधार और विकास का कार्य संभाला,
ताकि उनका नसीब बना रहे।।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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