थे कुछ लोग जो शहर की तलाश में निकल गए,
खेत खलियान छोड़ सड़कों की तलाश में निकल गए,
संतरों के पेड़ों पर लगे फल कौन चुरायेगा अब,
बच्चे सपनो की तलाश में आशा के साथ निकल गए।
कुछ टूटी दिवारों के पीछे कुछ बूढ़े चेहरे रह गए ,
सपने बड़े भी नहीं थे, जरूरतों के साये काले फिर गए,
प्यासे खेत पानी की चाह में सुख कर पत्थर हुए जब,
भूखे पेट, खाली हाथ काम की तलाश में घर से निकल गए।
कोई नहीं रोया बिछड़ कर दरों दीवारों से, बस चले गए,
नहीं बचे थे आंसू आँखों में, बेकारी की आग में जल गए,
कहाँ कहाँ फिरते शहर शहर बन कर बोझ उनके कंधो पर,
बूढ़े माँ बाप कुछ उमींदों के सहारे घरों में ही रह गए।
खाली छतों पर कुछ रोज़ उछलेंगे बन्दर ख़ुशी से नाचेंगे,
खाली खेतों को देख वह भी भोजन की तलाश में चले जायेंगे,
शहर के शोर में भूल जायेंगे गांव की और गए रास्तों को,
घर धीरे धीरे खंडहर हो जायेंगे, बूढ़े भूत से नज़र आएंगे।
शहर की तलाश में न जाने कितने गाँव खोते चले जायेंगे,
कुछ झुगियों के दायरे शहरों में यूँ ही बढ़ते चले जायेंगे,
आएंगे कभी कभी गांव खेत खलियान रातों को सपनों में,
सूखे दिल कुछ आंसुओं की तलाश में तड़पते रह जायेंगे।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







