Blog_ सफ़र या सफर
हां सफ़र और सफर दोनों अलग अलग है,आइये इसका गूढ़ रहस्य समझते हैं,ये शब्द हमारी हकीकत को स्पष्ट शब्दों में रेखांकित करते हैं जहां सफ़र का मतलब वो रास्ता है जिस पर चलकर हम जीवन को आगे ले जाते हैं,वही दूसरी ओर सफर का अर्थ वो मुश्किल जो जीवन जीने के राह में हम फेस करते हैं, मानसिक रूप में,या विचारों से घिरकर सफर (बीमार) में रहते हैं,ये दोनों शब्दों अपने आप में बहुत कुछ बयां करते हैं, हमें निर्माण जीवन का करने में सही निर्णय लेना होगा की सफ़र, चुनें या सफर,
अक्सर सही समय पर सही निर्णय ले लेना ही आधा रास्ता तय कर देता है,
इसलिए निर्णय निर्माण बहुत सोच समझ कर करना पड़ेगा। हमें सफ़र चुनना है ना कि सफर,इस सफर में फंसा इंसान अपने जीवन में भटकाव में बहाता हुआ, खुद में उलझकर रह जाएगा,वो सफ़र को कर ही नहीं पायेगा, और अपने सफर में उलझकर वो हर दम अपने आप में दफ़न होता रहेगा।
मैं नीतू डायरी पिछले 7 सालों से लिख रहीं हूं उसका एक किस्सा आज आप लोगों के साथ शेयर कर रहीं हूं जो एक कहानी कहकर जायेगा, और इस थीम को सारगर्भित करेगा।
बात कुछ ऐसी है विजय नाम का एक लड़का अपनी जिंदगी में बहुत प्रयास किये, यूपीएससी,से लेकर हर छोटे-बड़े परीक्षा के पेपर दिये, और इस बार उसका लास्ट अटेम्प्ट बचा था,ऐसे में उसने बहुत मेहनत की परन्तु कुछ नम्बर की वजह से उसका नहीं हो पाया,अब तक का ये उसका सफ़र था, जो उसने साहस हिम्मत,से लड़ा था,पर जब वो कुछ कर नहीं पाया तब वो अपने माता-पिता से मिलने गया, और जब वो वहां से आया तो मानसिक रूप से इतना सफर में था की,वो उस दिन क्या कर रहा, कहां जा रहा उसे कोई पता नहीं था,सबसे पहले वो ट्रेन के लिए स्टेशन पर बैठा था ,तभी टीटी आया और उसका टिकट के लिए 100₹ मांगने लगा,तभी जीवन ने कहां की मुझे बस आगे वाले स्टेशन पर उतरना है,उसके लिए १००₹ नहीं दूंगा, टीटी बोलो की तुम पर अब में 300₹ का फाईन काटूंगा,तभी जीवन ने भी बोल दिया, लेना हो तो 60₹ ले लो, इससे ज्यादा नहीं दूंगा,
उस दिन न जाने जीवन किस मानसिकताओं से जूझ रहा था वो बिल्कुल नहीं डरा, और बोला की टीटी सर आपको जो उचित लेंगे आप करिये,
और इतना बोलकर दूसरे टीटी कै बोलकर विजय का नाम पता, आधार कार्ड मांगने लगा, उसने बिना सवाल किये, दें दिया, टीटी भी बहुत गुस्से में था, फिर टीटी बोलो चलों हमारे साथ,तो जीवन उनके साथ चलने लगा, और फिर दोनों टीटी और जीवन एक कमरे में बैठ कर समझाने लगें की 300₹ दें दो पर विजय ने नहीं दिये, और टीटी ने भी हारकर बोला की तुम जाओ यार तुम सरफिरे से लगते हो, विजय अपने ही विचारों से फिर सफ़र में सफर करने लगा और,
जैसे ही स्टेशन पर उतरा वो वहीं खड़ा रहा इतने उसकी आगे की ट्रेन निकल गई,वो फिर बस के इंतजार में बैठा तो सोचने लगा की बस में अभी 30 मिनट लगेगा क्यों न टैक्सी कर ली जाये,वो वहां से टैक्सी की तलाश में आगे गया तो टैक्सी का किराया ज्यादा मंहगा होने की वजह से उसने टैक्सी छोड़ी, फिर उसे वहीं आता हुआ ट्रैक दिखाई दिया, उसने रोका और बोला मुझे आगे तक छोड़ दोगे,तब ड्राइवर बोला.100₹ लगेगा,उसने उसे भी छोड़ आगे चला गया, फिर वो पैदल चलता रहा और दुसरे स्टेशन पहुंच गया, और ट्रेन का इंतजार करने लगा।
सोचिए एक घंटे का पूरा रास्ता उसने 24 घंटे में पूरा किया, क्योंकि वो सफ़र में तो था पर मानसिक रूप से सफर कर रहा था।उसे नहीं पता वो क्या कर रहा है, frustrated होकर वो सफर करता रहा, आज ये कहानी केवल विजय की नहीं है बल्कि हर उस व्यक्ति की है जो सफर कर रहा है,
इसलिए हमें सफ़र करना है सफर नहीं, और सोचना है तो सकारात्मक सोचें, और जीवन की हर मुश्किल से लड़ें, एक योद्धा की तरह, भीड़ का हिस्सा बनने से बेहतर है भीड़ में कुछ अलग दिखों"
लेखिका- नीतू धाकड़ नरसिंहगढ़ मध्यप्रदेश, राइटर कवयित्री, यूपीएससी छात्रा, सोशल वर्कर


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