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Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

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The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

जब तक जड़ नहीं बदलेंगी, शाखाएं फिर उगेगी

शिक्षा में बदलाव की आवश्यकता : अधिकारों से पहले संस्कार और समझ

हाल ही में सामने आए Trisha के case और उससे जुड़ी समाज की प्रतिक्रियाओं को देखकर जो एक बात मुझे बहुत गहराई से महसूस हुई है वो यह है कि - समाज में कानून बनते हैं, टूटते हैं, बहसें होती हैं, लोग पक्ष और विपक्ष में बंट जाते हैं… लेकिन अक्सर जड़ वहीं की वहीं रह जाती है।
तब महसूस हुआ कि शायद बदलाव की असली जड़ सिर्फ कानूनों में नहीं, सही परवरिश में है।
हर कुछ महीनों में एक नया कानून आता है। हर कुछ हफ्तों में एक नई बहस छिड़ती है महिलाओं के अधिकार, पुरुषों की जिम्मेदारी, समानता के नारे। ये सब ज़रूरी हैं, लेकिन अकेले काफ़ी नहीं हैं।

क्योंकि असली सवाल यह है — जो इंसान उन कानूनों को तोड़ता है, जो रिश्तों को तकलीफ़ देता है, जो किसी को चोट पहुँचाता है, वो इंसान कहाँ से आया? वो किस सोच के साथ बड़ा हुआ? उसे बचपन में क्या सिखाया गया - और क्या कभी नहीं सिखाया गया?
हम बार-बार उस पेड़ की शाखाएं काटते हैं जिसकी जड़ें हमने खुद सींची हैं। जब तक जड़ें नहीं बदलेंगी - शाखाएं फिर उगती रहेंगी।
अधिकार देने से इंसान नहीं बदलता। इंसान तब बदलता है जब उसकी परवरिश में वो मूल्य डाले जाएं जो उसे एक बेहतर इंसान बनाएं।
जब हम लैंगिकता और पालन-पोषण की बात करते हैं तो अक्सर सिर्फ लड़कियों की तकलीफ़ सामने आती है। लेकिन सच यह है कि यह मानसिक ढाँचा दोनों को नुकसान पहुंचाता है। बस तरीका अलग होता है। एक को दबाया जाता है, दूसरे को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है।
एक लड़का जिसे कभी अपनी भावनाएं व्यक्त करना नहीं सिखाया गया - वो बड़ा होकर उन्हें गुस्से में, नियंत्रण में, या चुप्पी में ज़ाहिर करता है। एक लड़की जिसे हमेशा सहना सिखाया गया - वो अपनी तकलीफ़ को जुबान देना ही भूल जाती है।
फिर इन दोनों को एक साथ जीने के लिए छोड़ दिया जाता है। एक को लगता है नियंत्रण करना उसका हक़ है, दूसरे को लगता है सहना उसकी नियति है। यह कोई दुर्घटना नहीं है - यह एक प्रशिक्षित ढांचा है जो हम खुद बनाते हैं।
कानून डर से रोकता है - समझ से नहीं।
समाज को सुरक्षित रखने के लिए कानूनों की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है। जब कोई आहत होता है, तब उसे संरक्षण और न्याय मिलना चाहिए - इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन इसके साथ एक सवाल भी मन में आता है - क्या हम केवल परिणामों को संभाल रहे हैं, या उनकी जड़ों को भी समझ रहे हैं?
सोचिए - जो घर में देखकर बड़ा हुआ है कि किसी को दबाना "सामान्य" है, जिसे सहानुभूति नहीं सिखाई गई - वो कानून से तब डरेगा जब पकड़ा जाएगा। लेकिन अकेले में? वहाँ कोई कानून नहीं पहुँचता। चरित्र वहाँ भी साथ रहता है - इसलिए चरित्र सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।
जब तक सही संस्कार नहीं दिए जाएंगे - चाहे समानता के कितने भी नारे लगाओ, कितने भी कानून बनाओ - अपराध बढ़ते रहेंगे, रिश्ते टूटते रहेंगे।
तो बदलाव कहाँ से आएगा?

01
घर में रोज़ मिलने वाले संदेश बदलने होंगे
बदलाव रोज़ की छोटी-छोटी बातों से आता है। लड़के को सिखाओ कि रोना इंसानियत है, कमज़ोरी नहीं। लड़की को सिखाओ कि "ना" कहना उसका अधिकार है, स्वार्थी होना नहीं। दोनों को घर के काम सिखाओ - खाना बनाना, सफाई करना किसी एक का काम नहीं है। दोनों की भावनाओं को समान रूप से सुनो, समान रूप से महत्वपूर्ण मानो। जब घर में यह दिखेगा - तभी बच्चा यह सीखेगा।
02
विद्यालयों में जीवन जीने की शिक्षा भी आवश्यक होगी
विद्यालयों में ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित की जाए जहाँ बच्चों को केवल किताबों का ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाई जाए।
जहाँ बच्चों को क्रमबद्ध तरीके से जीवन मूल्यों की शिक्षा दी जाए: भावनाओं को समझना और व्यक्त करना
रिश्तों में सम्मान और सीमाओं का महत्व
स्त्री और पुरुष को प्रतिस्पर्धी नहीं, पूरक दृष्टि से देखना
क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार को संभालना
सेवा, करुणा और समाज के प्रति उत्तरदायित्व
मानसिक शांति और आत्म-अनुशासन
हमारे प्राचीन ग्रंथ - वेद, उपनिषद, पुराण और भारतीय ज्ञान परंपरा - केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं, उनमें जीवन के गहरे सिद्धांत हैं जो मनुष्य को मनुष्य बनाना सिखाते हैं। इन्हें किसी एक धर्म के प्रचार के रूप में नहीं, बल्कि नैतिक और मानवीय शिक्षा के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। साथ ही आधुनिक मनोविज्ञान, वैज्ञानिक सोच और संवैधानिक मूल्यों को भी जोड़ा जाए ताकि शिक्षा संतुलित और समयानुकूल बने।
अपनी भावनाओं को कैसे समझें, किसी से असहमत होने पर बात कैसे करें, सीमाएं क्या होती हैं और उनका सम्मान कैसे करते हैं। भावनात्मक बुद्धिमत्ता, विवाद समाधान, और सहानुभूति - ये कौशल नहीं, ये इंसान बनने की बुनियाद हैं।

03
बड़ों को भी बदलना होगा -और यह सबसे मुश्किल काम है
जो पहले से 20-30-40 साल की मानसिक संरचना(conditioning)लेकर जी रहे हैं उनके लिए बदलाव तब आता है जब कोई उनसे बिना आलोचना के बात करे, जब गलती मानना शर्म की बात न हो। बातचीत ही शुरुआत हैं - घर में, दोस्तों में, सामाजिक माध्यमों पर। यह लेख भी उसी कोशिश का हिस्सा है।

04
मीडिया और संस्कृति को ज़िम्मेदारी उठानी होगी
जो फ़िल्में हम देखते हैं, जो गाने सुनते हैं, जिन नायकों से हम प्रेरित होते हैं - वो सब चुपचाप हमारी सोच बनाते हैं। जब नायक वही होता है जो "अधिकार जताता" है, जो "मना करने पर भी नहीं मानता" और उसे प्रेम जैसा दिखाया जाता है - तो बच्चे यही सामान्य मान लेते हैं।
कहानीकार, फ़िल्म निर्माता, और सामग्री निर्माता - इनकी ज़िम्मेदारी कानून बनाने वालों से कम नहीं है। क्योंकि ये वो लोग हैं जो असल में अगली पीढ़ी की सोच बना रहे हैं।

सच -
यह एक पीढ़ी का काम नहीं - लेकिन शुरुआत आज से होगी।
यह 2-3 पीढ़ियों की धीमी और धैर्यपूर्ण प्रक्रिया है। इसमें कोई छोटा रास्ता नहीं है। कोई एक कानून, एक आंदोलन, एक लेख - अकेले कुछ नहीं बदल सकता।
लेकिन हर बड़ा बदलाव कहीं न कहीं से शुरू हुआ है। किसी एक घर से, किसी एक माँ-बाप के एक फ़ैसले से, किसी एक शिक्षक की एक बात से जो किसी बच्चे के दिल में उतर गई।
सुरक्षा आज के लिए ज़रूरी है - इसलिए कानून बनने चाहिए।लेकिन
मानसिक संरचना का बदलाव कल के लिए ज़रूरी है - इसलिए परवरिश बदलनी चाहिए।
और ये दोनों साथ-साथ चलने चाहिए - एक दूसरे की जगह नहीं लेते, एक दूसरे के पूरक हैं।
अगर, आप यहाँ तक पढ़ रहे हैँ - तो शायद आप भी यही सोचते हैं। तो शुरुआत आपसे हो सकती है। अपने घर में, अपने बच्चों के साथ, अपने आसपास के लोगों के साथ।
बच्चे वो नहीं सीखते जो हम उन्हें बताते हैं।
बच्चे वो सीखते हैं जो हम उनके सामने जीते हैं।

एक ज़रूरी बातचीत की शुरुआत, शेयर करें, सोचें, बदलें।

प्रार्थना पाठक ( व्यक्तिगत विचार )




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रचना के बारे में पाठकों की समीक्षाएं (3)

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ललित दाधीच said

बहुत सुंदर चर्चा, जिसमें समस्या समाधान और अपने विचार तीनों समाहित है, समय रहते लोग, परिवार, समाज, हर इंसान और सरकार को ये पूर्णतः समझना होगा और इसपर क्रियाशील होना होगा। । ऐसे विषयों पर चर्चा करें, आपका स्वागत है इस मंच पर, जहाँ हर शब्द अपनी कहानी कहता है। ।

सरिता पाठक said

सर्वप्रथम प्रार्थना आपको बहुत बहुत सुभकामनाएँ अपने विचार लिखन्तु परिवार तक पहुंचाने ke लिए ये एक बहुत बड़ा कदम है लोगों की सोच को बदलने ka परन्तु आपको और किसी माध्यम से भी अधिक से अधिक लोगों तक अपना लेख पहुंचा सकें और उनकी मानसिकता को बदला जा सके जैसे social midiya ❤️👌

कृष्णा शर्मा said

बहुत खूबसूरती के साथ आपने अपनी चर्चा रखी 👏👏👏
ऐसे हीं लिखते रहे
सादर प्रणाम 🙏

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