एक पेड़ ने कहा
पथिक से
छांव तले
चैन पाते आप
सुकून मुझे मिलता
मेरा कोई स्वार्थ नहीं
फिर भी निभाता रिश्ता
दिल में दर्द रखता हूँ
अडिग खड़ा रहता हूँ
फिर भी मुझे
धराशाई करने में
मनुष्य को क्या मिलता
हर वक्त हवा के लिए
पत्तों को मैं कहता हूँ
तुम रहो
हिलते डुलते
मेरे आश्रय में
पथिक विश्राम करते
मेरे मन के मर्म
किसी को नहीं दिखता
ले कुल्हाड़ी आ जाते
मानवों में इतनी है हीनता
फिर भी मुझमें
दया बाकी है अभी
जब तक हूँ
सबको छांव रहूंगा देता।।
-ममता तिवारी
दर्द मर्म दया महानता


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







