(बाल कविता)
मिट्टी का प्यारा उपहार
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डलिया में आलू थे चार ।
सड़े हुए बिलकुल बेकार ।।
मम्मी ने उनको फिर छाँटा ।
चाकू से टुकड़ों में बाँटा ।।
टुकड़े फ़िर क्यारी में बोए ।
आलू सब मिट्टी में सोए ।।
मिट्टी ने फिर उन्हें जगाया ।
बहुत प्यार से सिर सहलाया ।।
आलू के टुकड़े फ़िर जागे ।
अंदर से बाहर को भागे ।।
अंकुर धीरे से मुस्काए ।
मिट्टी से बाहर भी आए ।।
संग हवा के नाचे गाएँ ।
खुश होकर पत्ते लहराएँ ।।
धीरे-धीरे बड़े हुए सब ।
अपने दम पर खड़े हुए सब।।
मम्मी ने जितने थे बोए ।
आलू के टुकड़े सब खोए ।।
आलू सड़े हुए फिर पनपे ।
जड़ में लगे बहुत से गुच्छे ।।
गुच्छे बड़े हुए जब सारे ।
माँ को लगने लगे दुलारे ।।
खुरपी से क्यारी खुदवाई ।
जड़ में निकले आलू भाई ।।
सड़े हुए आलू थे चार ।
लेकिन निकले कई हजार ।।
मम्मी कहतीं ये है प्यार ।
मिट्टी का प्यारा उपहार ।।
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~राम नरेश 'उज्ज्वल'


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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