"🌸 अंतर्मन 🌸"
मन के भीतर एक संसार है,
जहाँ मौन भी बोल उठता है।
भावों की निर्मल धारा में,
हर दुःख अपना अर्थ खोजता है।
कभी स्मृतियों के दीप जलें,
कभी सपनों के फूल खिलें।
कभी नयनों में नीर उमड़ता,
कभी अधरों पर हास्य खिले।
यह अंतर्मन बड़ा निराला,
इसकी महिमा अपरंपार।
कभी बन जाता शीतल चंदन,
कभी उठाता प्रश्न हज़ार।
बाहर से जो शांत दिखाई दे,
भीतर कितने भाव छिपाए।
हँसते मुख के पीछे जाने,
कितने आँसू कौन छिपाए।
जब जग का कोलाहल थमता,
जब नीरवता पास बुलाती।
तब हृदय की गहराइयों से,
एक अनोखी ध्वनि आती।
वह कहती है—हे पथिक, ठहर जा!
कुछ पल स्वयं से बात तो कर,
दूसरों को समझने से पहले।
अपने मन की पहचान तो कर।
नहीं आवश्यक जग जाने,
तेरे हृदय में क्या-क्या है?
नहीं आवश्यक हर एक व्यक्ति।
समझे तुझमें कितना धैर्य भरा है,
बस इतना तू स्मरण सदा रख।
सत्य-पथ से कभी न डिगना,
विपदा आए, दुःख घिर आए।
फिर भी आशा का दीप जलाना।
अंतर्मन के पावन आँगन में,
स्नेह-सुधा की वर्षा हो।
द्वेष मिटे, अभिमान झुके,
करुणा की शुभ सृष्टि हो।
जहाँ पराई पीड़ा अपनी,
जहाँ पराया भी अपना हो।
जहाँ प्रेम ही धर्म बने और,
मानवता का सपना हो।
कभी स्वयं से रूठ न जाना,
जब संसार पराया लगे।
जब अपने भी मौन खड़े हों,
जब हर पथ अनजाना लगे।
तब अपने विश्वास को थामे,
मन में नव उत्साह जगाना।
टूटे हुए स्वप्नों को चुनकर,
फिर से एक नया स्वप्न सजाना।
यह जीवन क्षणभंगुर सरिता,
बहता जल, बहती कहानी।
किसने यहाँ सदा सुख पाया,
किसकी रही अमर जवानी?
धूप मिले तो छाँव बनो तुम।
रात मिले तो दीप बनो,
किसी हृदय में पीड़ा देखो।
उस पीड़ा की प्रीत बनो।
न धन से मन समृद्ध बनेगा,
न यश से संतोष मिलेगा।
जब तक भीतर शांति न जागे,
मन को चैन कहाँ मिलेगा?
सच्चा सुख तो उसी हृदय में,
जहाँ सरलता का वास रहे।
जहाँ वाणी में मधुरता हो,
और कर्मों में विश्वास रहे।
अंतर्मन कोई गहन गुफा नहीं,
यह चेतना का पावन द्वार।
इसके भीतर झाँक सको तो,
मिल जाए जीवन का सार।
अपने दोषों को पहचानो,
गुणों का भी सम्मान करो।
जो कुछ सीखा, बाँटते चलो,
हर प्राणी से प्रेम करो।
जब मन निर्मल दर्पण होगा,
सत्य स्वयं प्रतिबिम्बित होगा।
जब अहंकार विलीन हो जाएगा,
जीवन पुष्प सुवासित होगा।
तब न ईर्ष्या मन को घेरेगी,
न कटुता का होगा बंधन।
प्रेम, दया और सत्य से महकेगा,
तुम्हारा पावन अंतर्मन।
इसलिए स्वयं को जानो पहले,
अपने मन का मान करो।
जीवन के इस कठिन पथ पर,
आशा का सम्मान करो।
जग में चाहे मान मिले न मिले,
अपने कर्म महान बनाना।
और किसी की आँखों में आँसू हों,
तो मुस्कान का फूल खिलाना।
अंतर्मन की यही साधना,
जीवन का श्रृंगार बने।
हर हृदय में प्रेम जागे,
हर आँगन त्योहार बने।
मन में शुचिता, वाणी में माधुर्य।
कर्मों में सद्भाव रहे,
जब तक साँसें साथ निभाएँ।
मानवता का भाव रहे।
क्योंकि अंतर्मन की गहराई में,
एक दिव्य प्रकाश समाया है।
जिसने स्वयं को जान लिया,
उसने जीवन-तत्त्व पाया है।
जग को जीतने से पहले,
अपने मन पर विजय पाना।
यही साधना, यही आराधना,
यही जीवन का सच्चा खजाना।
✍️ रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज
पूर्वी चम्पारण, (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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