मेरी चौखट पर खड़ा था, आफ़ताब कोई मशाल लिए..
वहीं बदला वक्त भी था, अपनी कोई चाल लिए..।
पंछी ने किया था, आग़ाज़-ए-सफ़र-ओ-परवाज़ मगर..
आ गए हर तरफ़ से सय्याद कई, हवस-ओ-ज़ाल लिए..।
वक़्त के किसी मंज़र में, बहुत देर रुक रहा था मैं..
कभी उनको भुलाते हुए, कभी उनका ख़्याल लिए..।
मुझे तो इस शहर में मिला, हर शख़्स मिजाज़-ए-पुर-सुकूं मगर..
फ़िर वो कौन खड़े हैं, उस मोड़ पे हुज़ूम-ए-बवाल लिए..।
कदम-कदम पे मुलाकात हुई, फ़रेब-ए-ज़िंदगी से मगर..
किसी तरह से ए'तिबार के साँचे में, हमने ख़्वाब सब ढ़ाल लिए..।
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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