मानव शरीर और इस व्यावहारिक संसार का निर्माण सत्व, रजस और तमस के एक निश्चित व्यावहारिक पदानुक्रम में हुआ है। हमारा सिर यानी कंठ से ऊपर का भाग, जहाँ मस्तिष्क और ज्ञानेंद्रियाँ हैं, सत्व रस से निर्मित है। यह एक स्थिर प्रभाव क्षेत्र है जहाँ चेतना की स्वगति होती है, विचार स्वतः स्फूर्त आते हैं और अहंकार भी यहीं निवास करता है। मनुष्य का काम केवल इन विचारों को चुनना और उन पर मनन करना है। कंठ से लेकर नाभि तक का मध्य भाग रजस से बना है, जो राजा-महाराजाओं की तरह ऊर्जा के निरंतर आंतरिक बहाव का क्षेत्र है। यहाँ गति अपने आप होती है, लेकिन मनुष्य को इसकी भोजन और रखरखाव के माध्यम से बाहरी व्यवस्था करनी होती है ताकि संतुलन बना रहे। नाभि से नीचे का निचला पोर्शन विशुद्ध तमस है, जो मनुष्य की मूल योनि और ठोस कर्म का आधार है। यहाँ कोई स्वतः गति नहीं होती, बल्कि पैरों से उठने, चलने और गाड़ी चलाने जैसी हर क्रिया के लिए मनुष्य को स्वयं सक्रिय शारीरिक प्रयास और गति देनी पड़ती है। जीवन की सबसे बड़ी भूल यही है कि लोग इन क्षेत्रों के मूल स्वभाव को आपस में मिला देते हैं। यदि कर्म क्षेत्र पैरों में निष्क्रिय सत्व विचार डाल दिए जाएं या सिर के सात्विक क्षेत्र में तमस या रजस की विकृति भर दी जाए, तो पूरा संतुलन बिगड़ जाता है। कालक्रम का बदलना भी यही दर्शाता है कि यह शरीर न तो पूरी तरह स्थिर है और न पूरी तरह गतिशील, बल्कि इसके प्रत्येक भाग को उसकी प्रकृति के अनुसार चलाना होता है, तभी काम सिद्ध होता है।
इस अनजान संसार में कोई भी व्यक्ति सर्वाइवल के इस भौतिक जाल से पूरी तरह बाहर नहीं निकल सकता। यहाँ की अस्सी प्रतिशत दुनिया पूरी तरह भौतिकता और अस्तित्व को बचाए रखने के संघर्ष से घिरी है, जहाँ लोग सगे होकर भी अनजान हैं और केवल अपने स्वार्थ के काम तक एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। यहाँ नब्बे प्रतिशत से अधिक आबादी बिना शक्ति और तमस के प्रभाव के सर्वाइव ही नहीं कर सकती, इसीलिए आदिम काल से ही मांसाहार और कामुकता (सेक्स) जैसी बुनियादी तामसिक प्रवृत्तियों का सबसे अधिक प्रभाव रहा है। संसार में अठासी से नब्बे प्रतिशत लोग केवल 'ट्रिक' और जुगाड़ से अपना दैनिक काम निकाल रहे हैं, कोई गहनता नहीं है। इसके बाद केवल दस प्रतिशत हिस्सा सामाजिक संतुलन का है, और अंतिम दस प्रतिशत वह सर्वोच्च अवस्था है जिसमें मनुष्य सांसारिक 'ट्रिक' की दौड़ से पूरी तरह ओझल हो जाता है। वह केवल अपने विचार पर अड़कर, समय की परवाह किए बिना धुन में काम करता है और जब वह अपने विचार को तमस (कर्म) के धरातल पर पूरी तरह 'सेट' कर देता है, तो वही इतिहास बनता है और अमर हो जाता है। लोग जिसे ध्यान, सिद्धि या मोक्ष कहकर बड़ी-बड़ी भ्रामक बातें फैलाते हैं, वह कोई जादुई चमत्कार नहीं है। आज तक किसी ने उसको नहीं देखा जिसने सबको देखा है। तथाकथित सिद्धियाँ केवल मस्तिष्क की स्वगति को बार-बार जनरेट करके उसे एक अतिरिक्त गति (एक्स्ट्रा स्पीड) देने का खेल है, जिससे दिमाग के भीतर एक ऐसी नई राह खुल जाती है जहाँ जाकर मनुष्य का चित्त शांत बैठ जाता है।
यह संपूर्ण धरती और इस पर मौजूद जीवन कोई अचानक हुआ संयोग नहीं, बल्कि ईश्वर का सबसे बड़ा और सफल वैज्ञानिक प्रयोग है। ब्रह्मांड में आने वाले आंधी-तूफान, सुनामी, भूकंप और ज्वालामुखी का फटना उसी परम रचयिता द्वारा किया जाने वाला प्रचंड तामसिक शक्तियों का प्रयोग है, क्योंकि बिना इस विनाशकारी शक्ति के धरातल पर किसी रचना को टिकाया नहीं जा सकता था। अंतरिक्ष में फैले अरबों वीरान ग्रह ईश्वर के अध-अधूरे या असफल प्रयोग हैं। खरबों प्रयासों के बाद जहाँ सत्व-रज-तम का यह सटीक कॉम्बिनेशन बैठ पाया, वह एकमात्र हमारी धरती है; यह जीवन उस ईश्वर की एकमात्र सफलता है। इस सफलता में जो सबसे शुद्ध, मौलिक और अकाट्य कृति है, वह इंसान है। ईश्वर का एकमात्र गुण जो इंसान को विरासत में मिला है, वह है 'निरंतर प्रयोग करना और असफलताओं से ही सफलता की राह खोजना', इसीलिए मनुष्य आज भी केवल वैज्ञानिक प्रयोगों को ही अंतिम प्रमाण मानता है। इस वास्तविकता को जानने के बाद मनुष्य को भीतर तक दहक जाना चाहिए कि संसार में दुखी या परेशान होने जैसी कोई चीज़ नहीं है, मनुष्य अपने ही विचारों के जाल में खुद परेशान होता है। आपके पास आधार में तमस रूपी ठोस कर्म की शक्ति मौजूद है; उठो, पैर बढ़ाओ, ऊर्जा को बाहर की तरफ ढकेलो और अपना काम करो। बिना प्रयोग के कुछ नहीं होता, निरंतर प्रयोग करते हुए अपने विचारों को कर्म के धरातल पर पूरी तरह व्यवस्थित कर देना ही जीवन की असली पहचान है।
• संसार का सबसे कड़वा सच यही है कि जो जीवन रूपी प्रेम देता है, वही अंततः मृत्यु रूपी प्रहार भी करता है; रचना और विनाश एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।"
• "लोग केवल अंतिम नतीजा देखकर किसी को अच्छा या बुरा कह देते हैं, वे उस नतीजे के पीछे की पूरी 'कैसेट', परिस्थिति और माहौल के बहाव को देखने से कतराते हैं।"
• "इस अनजान संसार में कोई किसी को बचाने नहीं आता; यहाँ ९०% तामसिकता के प्रभाव (भोजन, मांसाहार और सेक्स) के बिना सर्वाइव कर पाना ही नामुमकिन है।"
• "इंसान इस पूरी सृष्टि की सबसे मौलिक, शुद्ध और अकाट्य कृति है क्योंकि ईश्वर ने इसके भीतर सत्व, रजस और तमस की व्यवस्था को बिल्कुल सटीक अनुपात में सेट किया है।"
• "संसार में आपकी कोई पहचान नहीं है अगर आपने अपने भीतर के विचार को सत्व और रजस से गुज़ारकर तमस (कर्म) के धरातल पर पूरी तरह सेट नहीं किया है।"
• "लोग सगे होकर भी एक-दूसरे के लिए अनजान हैं, यहाँ हर रिश्ता सिर्फ ज़रूरत के काम तक निर्भर रहने और न रहने की एक छिपी हुई 'ट्रिक' है।"
आज तक किसी ने उसको नहीं देखा जिसने सबको देखा है; लोग जिसे सिद्धि या ईश्वर दर्शन कहते हैं, वह केवल मस्तिष्क द्वारा जनरेट की गई एक तरंग है, उससे ज़्यादा कुछ नहीं।"
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







