आफ़ताब सुनाने लगा, सर्द रातों की दास्तां..
कांपते हुए हाथों से, अलाव तापता आसमाँ..।
धूप की खिड़कियों पर, कौन पर्दे डाल गया..।
गुलिस्तां में पंछियों की है, खामोश हुई ज़ुबाँ..।
शब–ए–बदन में, विरह की आग सुलगने लगी..
सांसों में उठने लगा, सर्द आहों का धुआँ..।
देवदार के पत्तों से, झर–झर बहने लगी शबनम..
आसरा तलाशने लगा, गली का आख़िरी आशियाँ..।
धूप सिमट कर जा बैठी, फिर परबत के उस पार..
थरथराते लबों से हो रहे, गुल–ओ–चमन के बयाँ..।
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







