महितल सारा ठिठुर रहा था
छुप-छुप आसमाँ रोता था,
सर्द आँचल में लिपटा भानु
दिन-दिन भर जो सोता था,
फिर बढ़ने लगा दिन धीरे-धीरे
शीतलहर ने पीछा छोड़ा,
उत्तरायण को हौले-हौले
रथ अपना दिनकर ने मोड़ा,
ली अंगड़ाई किरणों ने अब
खिली धूप की काया रे!
सुरभित पवन झकोरे लेकर
सखे, वसंत फिर आया रे!
मस्त हवा की स्वरलहरी पर
नर्तन कर रही वल्लरियाँ,
प्रणय गान सुन भ्रमरावली के
घूँघट पट खोली सब कलियाँ,
रास रचायी खूब सरसों जब
मटर के संग गलबहियाँ डाले,
अलसायी अलसी इठलाकर
कहे, मुझको भी गले लगा ले,
फेंक किनारे ओस की चादर
दुबका दुब मुस्काया रे!
सुरभित पवन झकोरे लेकर
सखे, वसंत फिर आया रे!
पुलकित यामिनी होने लगी अब
दिवस युवा है डोरे डाले,
धरा व्योम भी एक हो रहे
दूर हया के फेंक दुशाले,
मदनमस्त की मादकता से
वन प्रांतर अब बहक रहे हैं
डाल-डाल क्या पात-पात पर
विहग वृन्द सब चहक रहे हैं
प्रकृति ने खुद नव श्रृंगार कर
गीत नया अब गाया रे!
सुरभित पवन झकोरे लेकर
सखे, वसंत फिर आया रे!
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प्रमोद कुमार
गढ़वा (झारखंड)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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