विषय - राष्ट्रीय एकता और वर्तमान भविष्य
विधा- मिश्रित
जैसे हम जानते हैं कि आज हमारा भारत विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। ऐसे में हमारा वजूद और पराम्परागत संस्कृति और सभ्यता अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचती नज़र आ रही है,हमारा विकसित भारत(2047) बनाने का सपना और साथ में गरीबी जैसी समस्या को खत्म करने के लिए सतत् विकास लक्ष्य 2030 के लिए बनाए गए हैं। हमारी भारत भूमि वेदों पुराणों ग्रंथों से पिरोई गई भूमि है जहां एकता अपना रंग बिखराये हुये है।
राष्ट्रीय एकता हमारी भाषा और भाईचारे के साथ हमारे संविधान में भी प्रतिफल झलकता है, हमारे देश की यही पहचान है, जहां बहती हुई शीतल हवाओं हो या नदियों का पवित्र संगम सब एक दूसरे से समांजस्य और सहभागिता से नित ऊंचाईयां को बढ़ते जा रहे हैं,
वर्तमान भारत -
हमारा भारत देश एक तरफ़ जहां विकास की और तीव्र उन्मुख हो रहा है वहीं दुसरी तरफ वैश्विक स्तर पर चलते विद्रोह जैसे रूस यूक्रेन, इजरायल हमास,भारत पाकिस्तान और भी बहुत सारी विद्रोह विप्लव जो इसका नकारात्मक प्रभाव हमारे देश और समाज पर पड़ता है, जहां एकता को भी जवाब देना पड़ता है,, जैसे हाल ही में हुआ अमेरिका का टैरिफ प्लान और भारत की रणनीति ने अपनी सुझबुझ से अपनी संप्रभुता और एकता का परिचय दिया।
कितने ही निशाने लगा लो ,
मेरे भारत देश की मिट्टी है,
ये पानी से नहीं , ख़ून से सिंची है,
आज का युग नित नए नए आविष्कारों से साराबोर है जहां आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता अपने चरमोत्कर्ष पर है,ऐसे में हमारी राष्ट्रीय एकता को खतरा हो सकता है जहां इसका एक पहलू सकारात्मक है तो दूसरा नकारात्मक भी है जिसका प्रभाव हमारी भाषा, संस्कृति, समाज, बच्चें,देश, सभी पर पड़ेगा, हमें इसलिए नये नये आविष्कारों के साथ सामंजस्य स्थापित करने के लिए उसका सही प्रयोग करना जरूरी है ताकि राष्ट्रीय एकता अखंडता संप्रभुता बनी रहें।
भारत देश की विशेषता रही है की एकता में अनेकता... ऐसे में हमारा कर्तव्य है कि देश को एक अच्छा वातावरण और समाज दें जहां एकता के साथ सब आपस में खिलखिलते रहें।
कुछ लाइन राष्ट्रीय एकता के लिए
की देखा है मैंने वो ग़ुलाम भारत,
देखी है मैंने वो उजाड़ा दामन,
कैसे मेरा देश महान बना है,
सुनो तो सुनाऊं मैं तुम्हें।
वो वल्लभ भाई पटेल का रियासतों को जोड़ना,
वो लक्ष्मी बाई का अंग्रेजों से लोह लेना,
वो गांधी का सत्याग्रह करना,
वो भारत की एकता का झलकना।
हमारा नाम ही काफी है,
ये देश ही काफी है,
यहां की गंगा अमृत की दिवानी है,
यहां का कंकड़ में शंकर है।
की देखा है मैंने वो ग़ुलाम भारत,
देखी है मैंने वो उजाड़ा दामन,
निष्कर्ष - देश में बदलते वक्त के साथ हमें खुद को मजबूत बनाना होगा और एकता के साथ हमें पर्यावरणीय समास्याओं से निपटने का उचित मार्ग ढुंढना होगा और अपने देश को विश्व गुरु बनाने में अग्रसर होना है।
लेखिका कवि-नीतू धाकड़ (अम्बर) नरसिंहगढ़ मध्यप्रदेश


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