काश कोई समझ पाता
हर इंसान अपने चेहरे पर
एक झूठी मुस्कान सजाए रहता है,
कोई पूछ ले— क्या हाल है तुम्हारा?
तो मुस्कुराकर बस यही कहता है—
मैं अच्छा हूँ…
पर उस मुस्कुराहट के पीछे
कितने दर्द दबे हैं,
कितने आँसू पलकों पर ठहरे हैं,
कितने अरमान ख़ामोशी में बिखरे हैं—
यह कोई नहीं समझ पाता।
कितना कठिन है पढ़ पाना
किसी के मौन की भाषा,
किसी की आँखों में ठहरा दर्द,
किसी के हँसते चेहरे के पीछे
छिपी हुई उदासी को…
कोई बिरला ही मानुष होगा
जो बिना कहे समझ सके
दूसरे के हृदय की पीड़ा,
जो आँखों में उमड़ते आँसुओं को
पलकों से पहले पढ़ सके।
काश…
होता कोई ऐसा मानव इस दुनिया में,
जो किसी को दर्द में देख
बस इतना कह देता—
“तुम अकेले नहीं हो,
मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
जो बढ़कर किसी का हाथ थाम ले,
टूटते मन को थोड़ा-सा सहला दे,
हारी हुई हिम्मत में
उम्मीद का दीप जला दे,
और किसी का दर्द
अपने हिस्से का समझकर बाँट ले।
काश ऐसा हो पाता…
तो शायद इस दुनिया में
कोई इतना दुखी न होता,
किसी को अपने आँसू
मुस्कान के पीछे न छिपाने पड़ते।
फिर किसी चेहरे पर
झूठी मुस्कान न सजती,
हर आँख में सुकून होता,
हर हृदय में अपनापन होता—
और सच में,
सबके चेहरों पर
एक सच्ची मुस्कान होती।
— सरिता पाठक
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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