आदरणीय कवि एवं गीतकार स्वर्गीय प्रमोद तिवारी जी के प्रसिद्ध गीत "याद बहुत आते हैं गुड्डे गुड्डियों वाले दिन " से प्रेरित हो कर यह गीत उनको श्रद्धांजलि स्वरूप
याद बहुत
आते हैं
माटी की सौंधी
शामों वाले दिन,
बरगद नीचे
दादा बैठ सुनाते
किस्से वाले दिन,
कागज़ की इक
नाव बहाते
बरसातों की नदिया में,
भीगे पाँव
हँसी छुपाते
गलियों की उस बदरिया में,
टूटे सपनों को भी
हँसकर
जोड़ियों वाले दिन,
आधी रोटी
पूरा अपनापन
थालियों वाले दिन,
चन्दा मामा
छत पर आकर
आँख-मिचौली खेलें,
नींद उड़े तो
तारे गिनते
मन के पंछी झेलें,
बिन मतलब के
रूठ-मनोवल
यारों वाले दिन,
छोटे-छोटे
सपनों में ही
सारों वाले दिन,
बाबूजी की
डाँटों में भी
छुपा दुलार निराला,
अम्मा के आँचल जैसा
ना जग में कोई उजाला,
चूल्हे वाली
रोटी-साग,
अंगारों वाले दिन,
थोड़े पैसे
लेकिन दिल में
भंडारों वाले दिन,
पहली-पहली
चिट्ठी लिखकर
नाम छुपाया करते,
किसी गली के
एक मोड़ पर
घंटों जाया करते,
धड़कन में
महके चुपके
फूलों वाले दिन,
आँखों-आँखों
हो जाते थे
कूलों वाले दिन,
अब तो हर चेहरा
जल्दी में
भाग रहा है आगे,
मोबाइल के
उजले जंगल
सबको लगे हैं प्यारे,
फिर भी मन में
धीरे-धीरे
सीढ़ियों वाले दिन,
कोई लौटा दे
फिर से वो
पीढ़ियों वाले दिन।
याद बहुत
आते हैं
माटी की सौंधी
शामों वाले दिन,
बरगद नीचे
दादा बैठ सुनाते
किस्से वाले दिन.............


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







