प्यार में हारे व्यक्ति के पास अपने भीतर झाँकने का साहस नहीं क्रोध होता।
वह अपने दोषों से युद्ध नहीं करता, इलाज नही लेता।
बल्कि उसे ज्ञात होता है कि उस युद्ध में उसकी पराजय निश्चित है।
इसलिए वह एक सरल मार्ग चुनता है—
चरित्रवान के चरित्र पर प्रश्नचिह्न खड़ा करने का, हिंसा करके दबाने का।
जिसके भीतर शून्य होता है,
वही बाहर शोर करता है।
जिसकी आत्मा अस्थिर होती है, वही दूसरों की स्थिरता से विचलित होता है।
वह पहले दोष खोजता है—
सूक्ष्म से सूक्ष्म धब्बा तलाशता है,
कि कहीं कोई कमी मिल जाए,
जिसे वह प्रमाण बना सके।
पर जब उसे कुछ नहीं मिलता,
तो वह असत्य गढ़ता है।
लांछनों की रचना करता है,
और उन्हें बार-बार दोहराकर सत्य का आवरण पहनाने का प्रयास करता है।
उसकी सबसे बड़ी आशा यही होती है
कि चरित्रवान व्यक्ति आहत होकर संयम खो दे,
क्रोध में उतर आए,
और उसी स्तर पर आकर खड़ा हो जाए—
जहाँ वह स्वयं पहले से खड़ा है।
क्योंकि चरित्रहीन को सबसे अधिक भय
चरित्र की ऊँचाई से होता है।
उसे सत्य की चमक चुभती है।
वह समझ नहीं पाता
कि जिसे वह गिराने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा रहा है,
वह गिर नहीं रहा—
और उसकी अपनी थकान बढ़ती जा रही है।
चरित्र वह अग्नि है
जो जितना परखी जाती है, उतनी ही प्रखर होती जाती है।
पर एक सत्य और है—
अग्नि को अपवित्र करने की चेष्टा करने वाला
स्वयं राख बन जाता है।
क्योंकि समय प्रतीक्षा करता है…
और जब वह उत्तर देता है,
तो शब्दों से नहीं, परिणामों से देता है।
उस दिन, झूठ बोलने वाले को सफ़ाई देने का अवसर नहीं मिलता,
उसे अपने ही उच्चारे हुए शब्दों के नीचे
खड़ा होना पड़ता है।
और जब वही शब्द प्रश्न बनकर
उसकी ओर लौटते हैं,
तो उत्तर उसके पास नहीं होते।
क्योंकि सत्य को सिद्ध करने में समय लगता है,
पर असत्य को टिके रहने के लिए
हर पल नया सहारा चाहिए 'उपदेश'।
अंततः उद्घाटित यही होता है—
चरित्र पर प्रहार करने वाला
किसी और को नहीं,
अपने ही पतन को तीव्र कर रहा था।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







