नया दिन उगता है
जैसे मौन में छिपा कोई वादा,
क्षितिज की ओट से
धीरे-धीरे जन्म लेती उम्मीद।
रात की थकी साँसों के बाद
यह सुबह कुछ कहती है—
कि टूटना अंत नहीं होता,
हर बिखराव में भी एक सृजन पलता है।
हर चेहरा आज नया है,
कल की पीड़ा से धुला हुआ,
आँखों में अनदेखे सपनों की
भीगी-सी चमक लिए।
कदम फिर उठते हैं उसी राह पर,
जहाँ कभी ठहर गए थे हम,
पर इस बार मन के भीतर
डर नहीं—एक शांत विश्वास है।
कितनी बार टूटा यह मन,
कितनी बार बिखरी इच्छाएँ,
फिर भी हर सुबह
हमें धीरे-धीरे समेट लेती है—
जैसे माँ अपनी बाहों में
रोते बच्चे को थाम लेती है।
नया दिन सिर्फ सूरज नहीं लाता,
वह लाता है एक पुकार—
खुद को फिर से रचने की,
अपने भीतर के उजाले को पहचानने की।
इन नए चेहरों की भीड़ में
कहीं एक चेहरा मेरा भी है,
जो हर दिन थोड़ा-सा मरता है,
और हर दिन फिर से जन्म लेता है।
वही मैं—
पर हर सुबह
थोड़ा और सच्चा,
थोड़ा और जीवित।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







