Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

महादेव की विरासत

महादेव ने धन नहीं छोड़ा,
न स्वर्ण-महल, न रत्न-विभूषित आसन,
उन्होंने तो विरासत में दी
एक निर्वस्त्र-सी सरल साधना,
जिसमें मन हो मंदिर
और श्वास बने वंदन।

उन्होंने कहा—

जब संसार
तुम्हें उपलब्धियों के तराजू पर तोले,
तब तुम अपने भीतर के सत्य को तौलना।

जब लोग
तुम्हारी ऊँचाई नापें,
तब तुम अपने अहंकार की गहराई नापना।

यही शिव की पहली विरासत है—
बढ़ना, पर फूलकर न इतराना,
जलना, पर किसी को न जलाना।

महादेव ने छोड़ा नहीं
किसी राज्य का नक्शा,
पर दे गए कैलाश का रास्ता।

जहाँ पहुँचने के लिए
पहाड़ नहीं चढ़ने पड़ते,
बस भीतर की शोर करती भीड़ से
धीरे-धीरे उतरना पड़ता है।

उन्होंने विरासत में दिया—

जब अपमान मिले,
तो प्रतिशोध नहीं,
धैर्य का दीप जलाना।

जब छल मिले,
तो छलिया न बन जाना,
अपने सत्य को और चमकाना।

जब दुनिया
तुम्हारे आँसू पर हँसे,
तब मुस्कान से उत्तर दे जाना।

काँटों में भी फूल खिलाना,
टूटकर भी गीत सुनाना।

महादेव ने सिखाया—

विष हर युग में होगा,
कभी शब्दों में,
कभी रिश्तों में,
कभी अपने ही मन की अँधेरी सुरंगों में।

पर जो शिव का वंशज होगा,
वह हर पीड़ा को पी जाएगा,
और उस पीड़ा की राख से
नया उजाला सी जाएगा।

ज़हर को भी अमृत बनाना,
रोकर भी जग को हँसाना।

यही तो विरासत है उनकी—

नंदी जैसी निष्ठा,
गंगा जैसी पवित्रता,
चन्द्रमा जैसी शीतलता,
और अग्नि जैसी प्रखरता।

वह विरासत
जो तिजोरियों में नहीं मिलती,
जो वसीयतों में नहीं लिखी जाती,
जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी
मंत्र बनकर बहती जाती।

आज भी महादेव
अपने भक्तों से बस इतना कहते हैं—

“यदि मेरा उत्तराधिकारी बनना है,
तो मेरे त्रिशूल को मत उठाना,
मेरे धैर्य को उठाना।

मेरे डमरू को मत बजाना,
मेरे भीतर के मौन को जगाना।

मेरी जटाओं को मत सजाना,
मेरी करुणा को अपनाना।”

क्योंकि शिव की सबसे बड़ी विरासत
कैलाश नहीं,
करुणा है।

त्रिशूल नहीं,
संतुलन है।

तांडव नहीं,
अज्ञान के विरुद्ध जागरण है।

और जो इस विरासत को पा लेता है,
वह जीवन भर यही गुनगुनाता है—

न धन कमाना, न यश कमाना,
पहले खुद को शिव बनाना।

जग से क्या कुछ लेकर जाना,
शिव-सा होकर जग को सजाना।




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