विधा -कविता
विषय - आत्मा से परमात्मा तक का सफर
शीर्षक - रूह से रब तक
खुद को पहचानते हुये मैं,
आत्मा से परमात्मा तक पहुंचा।
कभी गिरते हुए तो कभी दौड़ते हुए,
परम पिता तक जा पहुंचा।
इस बाहरी दुनिया की चाकचौध में,
मैं समझ ना पाया अपना मोल।
राह मिली तो चला गया,
पकड़ हाथ परमात्मा का।
सब जगह भटका ,ठहरा रहा,
ध्यान ना दिया अपने मन का ।
खोज लगाने निकला एक दिन,
खोज लिया खुद के चित् को।
अब भाव यही आत्मा का,
निज पल खुद को खोज लूं।
ध्यान लगाऊं अपने अंतर्मन में,
करूं सफ़र परमात्मा का।
खुद को पहचानते हुये मैं,
आत्मा से परमात्मा तक पहुंचा।
कभी गिरते हुए तो कभी दौड़ते हुए,
परम पिता तक जा पहुंचा।
अब समझ गया इस शून्य तल को,
सारे स्वर मेरे अंदर है।
बस पहचान आत्मा की,
यही सभी अंतर्मन है।
लेखिका कवि-नीतू धाकड़ अम्बर नरसिंहगढ़


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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