ज़िंदगी
अब सीधी राह नहीं चलती,
वह मुड़कर ठहरती है
छोटे-छोटे हिस्सों में—
जैसे कोई अधूरा हिसाब
जिसे हर दिन
थोड़ा-थोड़ा पूरा करना पड़ता है।
सुबह उठते ही
एक नई किस्त शुरू होती है,
नींद अधूरी छोड़कर
जिम्मेदारियों का ब्याज भरना पड़ता है,
और दिन भर
हम अपने सपनों की मूल राशि
कहीं गिरवी रखे रहते हैं।
रात को
थकान का हिसाब जोड़ते हुए
लगता है—
आज फिर जी लिए,
या यूँ कहूँ,
आज फिर थोड़ा-सा चुक गए।
कभी बचपन था—
जहाँ ज़िंदगी एकमुश्त मिलती थी,
हँसी भी पूरी,
ख्वाब भी पूरे,
और थकान का कोई खाता नहीं होता था।
अब हर खुशी भी
ईएमआई पर मिलती है,
थोड़ी-सी मुस्कान,
थोड़ा-सा सुकून,
और बीच-बीच में
चिंताओं की पेनाल्टी।
हम जीते नहीं,
बस निभाते हैं—
रिश्तों की शर्तें,
समय की किश्तें,
और उम्मीदों के अनुबंध।
फिर भी
हर इंसान के भीतर
एक जिद बची रहती है—
कि किसी दिन
यह सारा कर्ज़ उतर जाएगा,
और हम
एक साथ जी पाएंगे
पूरा का पूरा जीवन।
लेकिन उस दिन के आने से पहले
ज़िंदगी
चुपचाप
किश्तों में ही खत्म हो जाती है।
डॉ. अखिलेश श्रीवास्तव


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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