प्यासे निकल पड़े हैं जल की तलाश में
सारे भटक रहे हैं एक खुशी की आस में
कांटों से जिंदगी का पता पूछते हैं गुल
बहारें छिपी हुईं हैं खिजाओं की आड़ में
महज चांद ही है इन तारों का हमसफर
सूरज ही गुम हुआ है घटाओं की बाढ में
जिन्दगी के दास हैं ऐसे मकाम पे पहुंचे
मिलते हैं चंद रोज ही खुद की तलाश में
कहने को सारी उम्र ये तल्खी में कट गई
बाकी है जो वो लिखी रब की किताब मेंII