ये ख़ाली हाथ ही बेहतर हैं, इन्हें तुम ना भरो,
अश्कों का मोल दुनिया की किसी आँख से ना करो।
वक़्त की फ़ितरत ही है गुज़र जाना ऐ दिल,
इस बहते हुए दरिया में ख़ुद को फ़ना ना करो।
ज़माना तो क़ैद करता है सिर्फ़ जिस्मों को,
अपने भीतर की सल्तनत को तुम ग़ुलाम ना करो।
भरोसा क्या करें इन अमीर-ए-शहर की चाहत का,
इस झूठी अमीरी की कभी आरज़ू ना करो।
दिखते हैं जो नज़दीक, वो अंदर से हैं तन्हा,
इन संग-दिलों से दिल लगाने की ख़ता ना करो।
दौलत के महल में भी सुकूँ कहाँ मिलता है,
इस तन्हाई के खँडहर में उम्र ज़ाया ना करो।
ना माँग 'ललित' किसी से अपने दर्द की क़ीमत,
तुम अपनी ख़ुद्दारी का सौदा सरे-बाज़ार ना करो।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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