सुदूर पर्वत से
लहराती, बलखाती धाराएं
आया करती थी,
ऊंचे पत्थरों से
गिरा करती थी,
नीचे पत्थरों पर
गिरा करती थी
गरज गरज कर
डराया करती थी,पर
अपनी ओर बुलाया करती थी
पत्थरों से जब
टकराया करती थी,
फव्वारों में उड़ते महीन जलकण में
लटक जाया करता एक इंद्रधनुष
सैलानी कभी झिझकते, डरते
कभी उत्साहित होकर
नहाते, उछलते, चिल्लाते
मेलों सा झुंड हुआ करता
आज इन
पत्थरों की ऊंची दीवार से
एक पतली लकीर सी गिरती
दिखाई देती है,जो कभी कभी
हवाओं की मार से
गायब भी हो जाती है
उड़ते वाष्प की गुबार में
छिप छिपकर तस्वीरें लेने की
चंचल युवा मन की हसरतें
मन ही मन घुटकर रह जाती है
निश्छल, निर्मल, चंचल
निर्झर की वो ध्वनि गुंजन,अब
सैलानियों की धड़कनों पर
राज नहीं करती है
ऊंची दीवार पर,जैसे
झूलता हुआ धवल परदा
नैनों को मंत्रमुग्ध नहीं करता
नीचे पाहन - वृंद से
टकराकर, वन क्षेत्र में प्रस्फुटित
संगीत तरंगें, सुषुप्त हो गये हैं,
कलकल धाराएं, निराश और उदास हैं
निष्ठुर, निर्दयी ग्रीष्म ने
झरने की ऐसी हालत कर दी है।।
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







