Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

रेत की तरह

रेत की एक अथाह परत पर ,
घूम रही है एक ऊष्मा किरण,
रेत के कण पर चमक दिखाती,
पल भर में कण में परिपक्व समा जाती,
जब तक ऊष्मा कण में ध्यान करती है,
तब तक रेत की अथाह परत ऊर्जा संचय की कहानी कहती हैं,
ऊष्मा का जब सफ़र कम होने लगा,
रेत का धरातल ध्यान में होने लगा,
अगली बारी ठण्ड ओस बूंदों की,
आएगी वो भी रेत में ध्यान करती,
अपनी विरह तड़प को कम करती,
रेत उस ओस सर्वस्व समर्पण में अपने,
पुराने दिन याद करता उसका भी था एक
गहराई धरातल, उछालें करती लहरें,
जीवन भी उसमें अंग अंग में बसा था,
जब ओस ध्यान का खत्म हुआ,
रेत का निर्विवाद सफ़र फिर शुरू हुआ,
हवाएं उसको जहां ले जाएं ,
वहीं उसकी हो जाए,
पानी गिरे तो झील बने,
धूप चले तो सूखा रहे,
रेत का है निर्विवाद जीवन,
जीवन उसका उसी में है,
बस औरों का जीवन उसमें ध्यान लगाएं,
वो अपने पास आने वाले के जैसे नहीं बनती,
बल्कि उसे उसी को वापिस लौटा देती,
गर्मी को गर्म रखें,
जो जिसका चेहरा है,
बस उसको कण कण से बताएं,
ठण्ड को ठण्डी रखें,
हवा को बताने को खुद लहराएं,
पानी को पानी रखें,
नासमझ के लिए दलदल हो जाए,
रेत खुद निर्विवाद है,
वो बस तुम्हारे साथ रहकर,
तुम्हें अपने पास रखकर,
तुम्हीं को तुम्हें वापिस करती है,
रेत , आकाश और समंदर,
अपने लिए ध्यान करती है,
ये निर्विवाद रहते हैं,
बस परम सत्य के लिए केवल नैसर्गिक क्रिया करते हैं,
परम सत्य तो क्या समझता है,
लगता है नैसर्गिक क्रिया को समझता है,
वही काम करते रहे करते रहे,
मौन से भी कम और नर्म आवाज,
जो काम करते रहने की धुन है,
करते रहे करते रहे,
बस यहीं कुछ उससे बातें होती है,
ऐसे मैं यह जाऊं निर्विवाद,
अपने ध्यान में,
नैसर्गिक काम में,
मौन से कम बोलूं,
बस ध्यान दाता से बात करुं।।

- ललित दाधीच।




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रचना के बारे में पाठकों की समीक्षाएं (2)

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रीना कुमारी प्रजापत 'मनस्वी' said

waah sir bahut sundar aajkal aap apni kalam ko bahut gehrai mein le ja rhe hain...bahut bdhiya sadar pranam aapko

ललित दाधीच replied

धन्यवाद ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️

मनोज कुमार सोनवानी "समदिल" said

अतिसुंदर अतिसुंदर अतिसुंदर अतिसुंदर अतिसुंदर 👌👌🙏 सागर की गहराई मन की गहराई से कम होती है।मौन से भी कम आवाज को सिर्फ वही सुन सकते हैं जिन्होंने ये आवाज़ का सृजन किया है।लौकिकता से अलौकिकता की ओर अग्रसर होती आपकी कलम को साधुवाद ! सादर प्रणाम 🙏🌹🙏🙏

ललित दाधीच replied

धन्यवाद ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️ ❤️

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