Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

मैं की नियति

मैं की नियति


भविष्य के लिए संभावनाएँ करना ही नियतिवाद है।
अतः अगर भविष्य की संभावना जता सकते हैं तो इससे यह पता चलता है कि हम नियतिवाद को मजबूत कर रहे हैं।
या फिर हम स्वतंत्र नहीं हैं क्योंकि हम अतीत को तो सोच सकते हैं क्योंकि वह हमें याद रहता है मस्तिष्क के रूप में,

और वर्तमान इसलिए है क्योंकि उसमें हम महसूस कर पा रहे हैं, अहसास हो रहा है और उसमें हो रहा है।

लेकिन भविष्य को संभावनाएँ देना या उसमें कुछ पूर्वधारणा करना जैसे शिक्षा के क्षेत्र में भविष्य की संभावनाएँ सबसे ज्यादा दर्शाई जाती हैं।

जैसे एक छात्र को कहा जाता है कि तुम मेहनत करो और तुम उस परीक्षा में पास हो जाओगे लेकिन ज़रूरी नहीं है वह बच्चा जब आगे पढ़ता है और क्या पता उसकी मृत्यु हो जाए,
उसी समय हार्ट अटैक हो जाए,
उसका मन कहीं ओर लग जाए,
प्रेम हो जाए, वह मतलब खाने में ज्यादा ध्यान देने लगे या कुछ और करने लगे तो क्या हम भविष्य को बताकर निश्चित तो नहीं है, ये तो नियति हुई।

हमारी सोच यह होती है कि हम अच्छा करना चाहते हैं यानी स्वयं को मजबूत दिखाना चाहते हैं कि भविष्य में हम मजबूत रूप में सामने आएं और स्वयं में बदलाव करें या अपने परिवार में अगर कुछ मुश्किल है या कुछ स्थितियाँ हैं तो उनको सुधार सकते हैं लेकिन यह समझ में नहीं आ रहा है कि मानव इतिहास में अपने अतीत को देखा हुआ है तो अपने इतिहास को इतना छोटा क्यों किया है?


मैं जब स्वयं को खोजता हूँ तो मेरे भीतर यह प्रश्न बार-बार आता है कि अगर मैं किसी भी उत्तर को पहचान लूँ तो क्या वह मेरा प्रश्न ही था?

अगर वह उत्तर मुझे मिलता है जिसकी शुरुआत एक प्रश्न से हुई और उस प्रश्न तक मैं कितनी परिस्थितियों से गया और उन्हीं परिस्थितियों से प्रश्न पर पहुँचने के बाद मैं उन्हीं परिस्थितियों से फिर एक उत्तर के पास गया उस उत्तर में मुझे जो मिला फिर अगर मैं उसको ग्रहण करता हूँ तो क्या मैं वह हो जाता हूँ जो मैं खोज रहा था, वह मैं हूँ या जो मैंने खुद को पा लिया वह मैं नहीं क्योंकि वह मेरा खोया हुआ था?

इसका मतलब मैं था तो मैं हो रहा है और मैं नहीं है तो मैं आ गया और मैं हो जाए तो मैं रहेगा तो मैं क्यों प्रश्न और उत्तर से आना-जाना हो रहा है तो मतलब...मैं की कोई पूर्व नियति ही हो रही है या मैं?

मैं अगर मेरा है तो मैं मेरे लिए मैं बनने के बाद मैं जो था वह मैं क्यों है?

जिंदगी में अगर सत्य में मुझको मैं खोजना है तो फिर मृत्यु किसको खोज रही है?

मैं की खोज मृत्यु है और मृत्यु ही मैं।

प्रश्न ही जिंदगी है और उत्तर मृत्यु मैं है।

उत्तर मृत्यु नहीं है, 'मैं' ही 'मैं' है।

कौन नियति है, मैं संभावना।

- ललित दाधीच




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