"ग़ज़ल"
काश! उस बे-वफ़ा से न मुझ को प्यार होता!
मिरी ज़िंदगी का हर पल न यूॅं सोगवार होता!!
उस के तीर-ए-नीम-कश का न मैं शिकार होता!
ऑंखों से नींदें उड़तीं न दिल बे-क़रार होता!!
क़यामत तक हम करते इंतिज़ार-ए-मेहरबानी!
ऐ हुस्न! तिरे वा'दों पे अगर ए'तिबार होता!!
गर सब को प्यार मिलता तो कुछ और बात होती!
ख़िज़ा के दौर में भी फ़सल-ए-बहार होता!!
मोहब्बत अगर न होती तो ये नफ़रत भी न होती!
काॅंटे-सा कोई चुभता न कोई गले का हार होता!!
इन ऑंखों की शराब जो होंटों से पिलाई होती!
मरते दम तक उस नशे का बाक़ी ख़ुमार होता!!
'परवेज़' इलाज-ए-इश्क़ कोई चारा-गर क्या करता!
वो शिफ़ा एक बार देता इश्क़ हज़ार बार होता!!
- आलम-ए-ग़ज़ल परवेज़ अहमद
© Parvez Ahmad


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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