हम बेघर हैं किस घर बुलाऊं आप जैसे शख्सीयत को वसी
मेरी शराफत लोग पहचान नहीं सका शख्सियत सड़कों पर
हम ढूंढ लेते हैं खिदमत करने का मौका इंसानियत के नातें
मेरी खिदमत न दिखने न दिखाने के काबिल है ये शख्सियत
ज़िंदगी क्या है ज़िंदगी गुजरी नहीं पूरी के जान लिया ज़िंदगी
उम्र मेरी जब सबाब तक पहुंची मां नाबीना बाप की मौत देखा
जन्म की धरती से हिजरत दूसरे शहर पहुंचा राश नहीं आया
उजड़ कर जहां पहुंचे ये शहर राजधानी है देश का दिल्ली है
हम कुछ बताने के काबिल नहीं हैं दोस्त कौन सुनता है ला मकां की बात
बताना भी अच्छा नहीं जबकि उम्र तन्हाई ज़िंदगी में मौत के क़रीब आ चुकी है
बच बच के चलते रहे न शिकवा करने न ही सुनने का मौक़ा मिला आजतक
आज़ जहां खड़ा है वसी कायनात के सिवा कुछ नज़र आता नहीं है इस ज़िंदगी में
हम सब कुछ भूल चुके हैं कि कहां था मैं वो कहां हैं अभी जहान में वसी
दो गज जमीं कहां मिलेगी सदा सोने वास्ते खयालों में नहीं आता क्या बताए वसी
खुदा खुदा नमाज़ नमाज़ सब फजूल जबकि इंसानियत की पहचान मालूम नहीं
इल्म का कोई ओर छोर नहीं असूल वो सच्चाई एक मोड़ पर खड़ा वजूद से अबतक
वसी अहमद क़ादरी
वसी अहमद अंसारी


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







