एक आकाश था भीतर मेरे —
नील,
इतना गहरा
कि शब्द उसमें डूबकर
अपने अर्थ खो बैठते थे।
मैंने सागर को देखा था
उसकी चंचल लहरों में,
उसकी थमी प्रार्थनाओं में;
और आसमान को भी
उजाले के व्रत में,
अंधकार के संकल्प में।
पर जो कभी न देखा —
वह उस दिन घटा,
जब तेरी आँखों ने
मुझ पर अपना नील रख दिया।
वह नील —
न रंग, न रूप,
बल्कि एक कम्पन था
जो मेरी आत्मा के किवाड़ों पर
बिना शब्द के दस्तक बन उतरा।
मन के भीतर एक खिड़की खुली —
बिना चौखट के,
बिना चूल के,
बस विस्तार —
जहाँ मैंने तुझे नहीं,
स्वयं को देखा
तेरे होने के पार।
तेरी दृष्टि —
जैसे आकाश ने अपना विस्मृत अंश
मेरे भीतर रख दिया हो,
और मैं उस नीलिमा में
अपनी सीमाएँ इस तरह भूलता गया
जैसे नदी अपना नाम भूल जाती है सागर में।
वहाँ कुछ सूक्ष्म तरंगें थीं —
शब्द नहीं,
पर गा रही थीं
एक अनसुना संगीत,
जिसे केवल आत्मा सुन सकती है
और फिर कभी भूल नहीं पाती।
मैंने सोचा —
यदि कोई मोक्ष है,
तो यही है —
तेरी आँखों का यह नील,
जहाँ देखना ही मिल जाना हो जाता है,
और मिलना ही विलीन होना।
पर फिर —
एक क्षण ऐसा आया,
जब उस खिड़की पर
कोहरा सा उतर आया —
वह कोहरा मेरा अपना अहंकार था,
जिसे मैंने दृष्टि समझ लिया।
और मैं अपने ही प्रतिबिंब में
अजनबी रह गया।
अब वही नील
एक खोज बन गया है —
हर दृष्टि में, हर श्वास में,
मैं उसी को ढूँढता हूँ,
जैसे कोई उस गीत की धुन ढूँढता है
जो कभी सुना ही नहीं,
पर जिसके बिना सन्नाटा भी बहरा है।
तू दूर नहीं —
बस मेरी दृष्टि पर
अहंकार की धुंध जमी है।
वरना वह खिड़की अब भी वहीं है,
वह नील अब भी वैसा ही है —
बस मैंने
अपनी ही पुतली के भीतर
एक दीवार खड़ी कर ली है।
और अब मैं —
उस नील का प्रतिबिंब नहीं,
बस एक प्रश्न हूँ
जिसका उत्तर
तेरी आँखों में होते हुए भी
हर बार मुझसे
ओझल हो जाता है —
इसलिए नहीं कि तू छुपा है,
बल्कि इसलिए कि मैं
अपनी ही छाया में
अपने आपको खोज रहा हूँ।
-इक़बाल सिंह ‘राशा’
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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