मैंने
अपनी हर सुबह
उनके नाम की रोटी पर परोस दी,
और हर रात
अपनी भूख को
आँखों की नमी में सुला दिया…
मैंने
अपनी हँसी गिरवी रख
उनके सपनों की छत उठाई,
और जब आईने के सामने खड़ा हुआ—
तो पाया…
मेरा चेहरा
जैसे कोई और था…
रिश्ते—
मेरे लिए
सिर्फ शब्द नहीं थे,
वे वह मिट्टी थे
जिसमें मैंने
अपनी रगों का लहू मिलाकर
खुद को बो दिया था…
पर जब फसल उगी—
तो अजीब दृश्य था…
हर ओर हरियाली थी,
पर
मेरे हिस्से की
कोई जड़ नहीं थी…
मैंने
अपने हर दर्द को
उनकी मुस्कानों के नीचे दबा दिया,
जैसे कोई माँ
अपने आँचल में
तूफान बाँध लेती है—
बिना किसी शोर के…
और फिर—
एक दिन…
उम्र की ढलती साँझ में,
जब मैं
अपने ही साए के पास बैठा—
समय ने
धीरे से पूछा—
“तू आखिर
किसके लिए जिया था…?”
मैं चुप रहा…
क्योंकि जवाब में
सिर्फ एक सन्नाटा था…
जिनके लिए
मैं खुद को मिटाता रहा,
वे—
मेरे नाम की धूल से भी
अनजान निकले…
जिन रिश्तों को
मैंने अपने लहू से सींचा,
वे
मेरी ही मिट्टी से उगकर
मुझे बंजर कह गए…
अब—
मैं खामोशी से पूछता हूँ
अपने ही दिल से—
“क्या सच में
मैं कभी किसी का था…?”
और दिल—
एक बूढ़े फकीर की तरह
धीमे से मुस्कुराता है…
“तू खुद का भी नहीं था…
तो फिर
किसी और का
क्या होता…?”
इक़बाल सिंह “राशा”
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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