दिन भर
मैं नाड़ी टटोलता हूँ,
रिपोर्ट पढ़ता हूँ,
एक्स-रे में
दर्द खोजता हूँ—
पर कई रोग
किसी मशीन में
नज़र नहीं आते।
कुछ पीड़ाएँ
बीपी से बाहर होती हैं,
कुछ घाव
त्वचा के नीचे नहीं,
समाज की
संवेदना में होते हैं।
जब दवाएँ
अपने शब्द खो देती हैं,
तब क़लम
अपनी भाषा शुरू करती है।
काग़ज़
मेरे लिए
केस शीट नहीं,
मानव आत्मा की
हिस्ट्री है—
जहाँ हर पंक्ति
एक दबा हुआ विलाप है।
मैं जानता हूँ—
लिखना
प्रिस्क्रिप्शन नहीं,
पर उपचार है;
यह वह दवा है
जिसका ओवरडोज़
भी जीवन देता है।
क़लम
कभी स्टेथोस्कोप बन जाती है,
कभी स्कैल्पल—
और कभी
बस
एक सहानुभूतिपूर्ण
स्पर्श।
कुछ रातें
ओटी से लंबी होती हैं,
जहाँ मरीज नहीं,
मैं स्वयं
निगरानी में होता हूँ।
तब काग़ज़
मुझे भी
मरीज बनने देता है,
और क़लम
बिना शुल्क
मेरी थेरैपी करती है।
मैं देखता हूँ—
बीमार व्यक्ति से पहले
बीमार व्यवस्था को,
और लिखता हूँ
ताकि
किसी अगली पीढ़ी का
इलाज संभव हो।
इसलिए
मैं केवल चिकित्सक नहीं,
एक साक्षी हूँ—
जो जानता है
कि हर सही इलाज
संवेदना से शुरू होता है।
और जब सब कुछ असफल हो जाए,
तो काग़ज़–क़लम
अब भी
अंतिम आशा रहते हैं।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







