एक पुराना गिलास था—
पूरा भरता ही नहीं था।
उसकी पारदर्शी देह में
एक खाली जगह थी,
जो शायद
किसी आहट को
अब भी सुनती थी।
किनारों पर
पीली पड़ी हुई शाम,
और तल में
लाल तरल की कुछ बूँदें—
चुपचाप
अपना रंग
बचाए हुए।
काँच से उठती
धातु-सी ठंडी गंध
जाने कितनी पुरानी
रातों को
जगा देती थी।
धूल आती रही—
चोंच-दर-चोंच,
धीरे-धीरे
किनारों पर
अपने पदचिह्न छोड़ती हुई।
उँगली छूती—
तो गिलास
टन्-टन् करता,
जैसे उसकी तह में
कोई नाम
अब भी पड़ा हो,
जिसे कोई
पुकारना भूल गया हो।
फिर एक दिन
उसमें नया तरल उतरा।
कुछ पल ठहरा—
फिर अचानक
फड़फड़ाकर निकल गया।
कबूतर की तरह—
आसमान की ओर नहीं,
धरती के भीतर,
उस अँधेरे की तरफ
जहाँ चीज़ें मिटती नहीं,
बस गहरी होती जाती हैं।
मैं देर तक
उस खाली गिलास को
देखता रहा।
वह सचमुच खाली था—
सिर्फ़ उसकी तह में
एक बूँद-सी शाम
अब भी काँप रही थी।
मैंने गिलास उठाया—
कुछ भी नहीं था उसमें।
फिर भी
उसे होंठों तक लाते ही
एक पुरानी शाम
मेरे भीतर उतर आई।
-इक़बाल सिंह “राशा”
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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