यदि भीतर
कोई बीज
पत्थर की छाती चीरकर
प्रकाश तक उठना चाहता है—
तो मिट्टी के डर से
उसे मत रोकना।
यदि स्वप्न
अपने रक्त की नमी में
रोप दिया है,
तो ऋतु के रूठने पर
उससे मुँह मत मोड़ना।
हो सकता है
रास्ते में
तुम्हारे पैरों से धूप उतर जाए,
सिर से छत छिन जाए,
अपने ही लोग
तुम्हारी आँखों में
अजनबी नगर खोजें।
हो सकता है
रोटी से पहले
तुम्हारी भूख
तुमसे समझौता माँगे,
और रात
तकिए की जगह
किसी ठंडे पत्थर पर
तुम्हारा सिर रख दे।
हो सकता है
हथेलियों में
फूल नहीं,
छालों की लकीरें उगें;
और तुम्हारा नाम
तालियों में नहीं,
उपहास के स्वर में
गूँजे।
तब भी—
चलते रहना।
क्योंकि
जिस पगडंडी पर
भीड़ नहीं चलती,
वहीं कभी
आदमी
अपने असली कद से
आँख मिलाता है।
अकेलापन
बंद कमरा नहीं—
वह खुली खिड़की है
जिसके सामने
आदमी पहली बार
अपना चेहरा
नाम से पुकारता है।
दुःख
तुम्हारा शत्रु नहीं,
वह कारीगर है—
जो तुम्हारे भीतर की
कच्ची धातु को
आग में नहीं,
धैर्य में तपाकर
तेज़ करता है।
इसलिए
जब समय
तुम्हारे माथे पर
हार की मुहर लगाने लगे,
तब भीतर
एक शब्द बचा रखना—
“अभी।”
अभी गिरना नहीं।
अभी रुकना नहीं।
अभी लौटना नहीं।
जो करना है,
उसे इतना सच कर
कि तुम्हारी अनुपस्थिति में भी
उसका अर्थ
धरती पर
साँस लेता रहे।
और यदि
कोई साथ न चले,
तो अपने कदमों की आवाज़ को
साथी बना लेना।
यदि हाथ थकें,
तो अपनी बची हुई साँसों को
रस्सी बनाकर
पत्थर उठाना।
यदि आँखें धुँधला जाएँ,
तो स्मृति में
उस सुबह को जगाना
जिसके लिए
तुमने पहली बार
अँधेरी रात को
ललकारा था।
चलते रहना—
क्योंकि मंज़िल
केवल वहाँ नहीं
जहाँ स्वप्न पूरा होता है;
मंज़िल वहाँ भी है
जहाँ रास्ते की हर चोट
तुम्हें थोड़ा और
तुम बना देती है।
और सुन—
जिस दिन
तुम पहुँचोगे
उस चोटी पर,
जिसे दूर से
तुमने आकाश समझा था,
उस दिन
यह मत मानना
कि युद्ध खत्म हुआ।
वहाँ
तालियों के पीछे
एक और सन्नाटा खड़ा होगा;
वहाँ
जीत के शोर के नीचे
एक और प्रश्न
सिर उठाएगा—
“अब तुम
अपने ही भीतर
किससे जीतोगे?”
तब
फिर उतरना भीतर।
फिर जलाना
वही पुरानी लौ।
फिर गढ़ना
अपने को।
क्योंकि
सच्ची विजय
चोटी पर खड़े होने में नहीं—
हर चोटी के बाद
अपने भीतर
एक और आकाश
खोज लेने में है।
इसलिए—
जो स्वप्न देखा है,
उसे
अधूरा मत छोड़ना।
और जो पूरा हो जाए—
उस पर
ठहर मत जाना।
चलते रहना।
-इक़बाल सिंह ‘राशा’
मनिफिट, जमशेदपुर, झारखण्ड


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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