ऐ शाम!!
तुम अपनी सिंदूरी रंग लेकर
सौम्य पवनों की उमंग लेकर
क्यूँ रोज चली आती हो?
मैं रोज मरता हूँ!
तुम्हारे जाने के बाद!
जब बिछ जाती हो
अस्ताचल के आसमान में
एकाएक दृष्टि खिंच जाती है
तुम्हारी सत्ता की ओर!
यादें, फिर से आगोश में
ले लेतीं हैं, उनकी केशुओं की
जो, मांथे से गिरा करतीं थीं
गालों पर, एक स्याह- लकीर
की तरह!
तस्वीर आ जाती है, सामने
दोनों होठों के बीच, निहारती
श्वेत दांतों की, जब वो
मुस्कराहट रोकने की कोशिश
किया करती थी!
तलाशतीं हैं, मेरी निगाहें,
टीले पर बैठी उस चुलबुली को
जो,उड़ती गौरैयों को
बुलाया करती थी,
अपने संग खेलने, बातें करने
और गीत गाने के लिए!
ऐ शाम!
जब तक
तुम अपने रंग में रहते हो,
मैं अपने रंग में नहाता रहता हूँ
तुम्हारा रंग ओझल होते ही
जब, आसमान में, एक काली
चादर बिछने लगती है,
मैं अपने रंग खो देता हूँ!
फिर से
एक बार मर जाता हूँ,
रोज की तरह!!
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







