'उषा'
अपनी शैतल्य भाव भरी
चंचलता की धन-वारिधी
पूरी की पूरी उड़ेल देती है
हम पर,आशीष भाव से
अपनी उंगलियों से पकड़ कर
दोनों बरौनियां आहिस्ता -आहिस्ता,
खोल देती है, नींदी नेत्रों को
ये कहते हुए, कि, जागो,
नहीं तो, तुमसे पूर्व,
सूरज जाग जाएगा,
गुदगुदी करती है,
हमारी कर्ण -द्वार पर, कुछ,
फुसफुसाती हुई कहती है,कि,
सुनो,आम की डालियों से
गीत तुम्हारी ओर
चली आ रही है
कुहु-कुहु -कुहु -कुहु की
घोल देती है,
एक अलौकिक नृत्य -रस
हमारे मन में,
तरंगित हो जाती है,हमारा
नस-नस,
एक सुंदर सी अंगड़ाई
हमें,ले जाती है, हमें,
अपने कर्म -पथ की ओर।।
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







