अपनी बात कहीं रखने में डर लगता है
अक़्सर मेरी बातों को जबरन पर लगता है
लोग कहानी बुनते हैं अपने माफिक
सुनने में अक़्सर गाँव शहर लगता है
मैं कैसा हूँ कोई भला कैसे जाना
खुद को समझने में तो जीवन भर लगता है
बातें भी चुभतीं हैं लगभग तीर के जैसी
अगले को कहाँ कुछ भी कहकर लगता है
जिसके दिल में जैसी - जैसी बात गयी,
वही जानेगा के कैसा मंजर लगता है
मुझमें गम का समंदर हैं जिनमे बातें मिलती हैं
आओ...डूबो....जानो कैसा बहकर लगता है
अपनी बात कहीं रखने में डर लगता है
अक़्सर मेरी बातों को जबरन पर लगता है
-सिद्धार्थ गोरखपुरी


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







