हर ख़ामोशी में भी कुछ कहने की आरज़ू है,
टूटे हुए ख़्वाबों को सँजोने की आरज़ू है।
हमने तो उम्र भर बस यूँ ही निभाया खुद को,
किसी को अब ज़रा-सी अपनाने की आरज़ू है।
रातों की स्याही से पूछो कहानी दिल की,
हर अश्क में एक नये सवेरे की आरज़ू है।
भीड़ में रहते हुए तन्हा ही रहे हम अक्सर,
आज इस तन्हाई से निकलने की आरज़ू है।
ज़ख़्म तो मिलते रहे रहगुज़र-ए-इश्क़ में,
पर हर ज़ख़्म में मुस्कुराने की आरज़ू है।
दुनिया ने बहुत कुछ दिया, बहुत कुछ छीना भी,
फिर भी दिल में बस सच्ची मोहब्बत की आरज़ू है।
कहे अखिलेश —दुआओं में इतना ही माँगा है,
कलम रहे सच के साथ, बस यही आरज़ू है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







